1993 के मुंबई बम धमाकों के दोषी और कुख्यात गैंगस्टर अबू सलेम को सर्वोच्च अदालत से बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने सलेम की उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें उसने समय से पहले जेल से रिहाई की मांग की थी। इस निर्णय के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि सलेम को कम से कम साल 2030 तक कालकोठरी में ही रहना होगा।
अदालत का स्पष्ट रुख न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने बॉम्बे हाई कोर्ट के अप्रैल 2025 के फैसले पर मुहर लगाते हुए कहा कि सलेम की याचिका समय से पहले और आधारहीन है। कोर्ट ने साफ कर दिया कि सलेम की 25 साल की सजा की अवधि नवंबर 2030 में पूरी होगी, उससे पहले उसकी रिहाई का कोई सवाल ही नहीं उठता।
अबू सलेम की दलीलें और प्रत्यर्पण का पेच सलेम ने अदालत में तर्क दिया था कि 2002 में पुर्तगाल से उसके प्रत्यर्पण के समय भारत सरकार ने आश्वासन दिया था कि उसे 25 साल से अधिक जेल में नहीं रखा जाएगा। उसने दावा किया कि विचाराधीन कैदी के रूप में बिताए गए समय और अच्छे आचरण के आधार पर मिली छूट को जोड़कर उसकी 25 साल की अवधि पूरी हो चुकी है।
क्यों खारिज हुई सलेम की मांग? सुप्रीम कोर्ट ने गैंगस्टर के इन तर्कों को पूरी तरह नकार दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रत्यर्पण संधि के तहत मिली 25 साल की अधिकतम सीमा अपने आप में एक राहत है। जेल नियमावली के तहत मिलने वाली सामान्य छूट का फायदा उठाकर इस 25 साल की कानूनी सीमा को कम नहीं किया जा सकता।
2030 तक सलाखों के पीछे न्यायालय ने गणना करते हुए कहा कि सलेम की 25 साल की कैद की अवधि उसकी गिरफ्तारी की तारीख यानी 11 नवंबर 2005 से शुरू मानी जाएगी। इस गणित के अनुसार, उसकी सजा का कार्यकाल नवंबर 2030 में ही समाप्त होगा। तब तक उसे जेल की कड़ी शर्तों के बीच ही समय बिताना होगा।
The Supreme Court has dismissed a plea by gangster Abu Salem, convicted in the 1993 Mumbai serial blasts case, seeking premature release. The court upheld the Bombay High Court s order, which had held that his petition was filed prematurely and that his 25-year sentence period… pic.twitter.com/UZSD2LpHgU
— IANS (@ians_india) September 10, 2026
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