सऊदी अरब के दक्षिणी हिस्सों में हूती विद्रोहियों के ताजा हमलों ने क्षेत्रीय सुरक्षा के दावों की पोल खोल दी है। इन हमलों के बाद चर्चा इस बात पर तेज हो गई है कि आखिर पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के बीच हुआ बहुचर्चित मक्का डिफेंस अलायंस सक्रिय क्यों नहीं हो रहा?
पाकिस्तान की चेतावनी और हकीकत पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने हाल ही में दावा किया कि सऊदी अरब पर किसी भी हमले की स्थिति में मक्का समझौता सक्रिय हो सकता है। उन्होंने इसे सामूहिक सुरक्षा का प्रतीक बताया था। हालांकि, हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी एनर्जी सेंटरों को निशाना बनाने के बावजूद पाकिस्तान ने केवल जुबानी समर्थन तक खुद को सीमित रखा है। पाकिस्तान की अपनी मजबूरियां हैं, जिनमें ईरान के साथ 900 किलोमीटर लंबी सीमा और देश के भीतर मौजूद शिया आबादी जैसे संवेदनशील कारक शामिल हैं।
तुर्की और सऊदी अरब का अलग रुख तुर्की, जो इस गठबंधन की सबसे आधुनिक सैन्य शक्ति माना जाता है, ने भी मक्का समझौते का जिक्र करना मुनासिब नहीं समझा। तुर्की के विदेश मंत्रालय ने हमलों की निंदा तो की, लेकिन उसने इसे क्षेत्रीय तनाव करार देते हुए कूटनीतिक समाधान पर जोर दिया। वहीं, सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान ने स्पष्ट किया कि सऊदी अरब अपनी रक्षा में सक्षम है और वे कूटनीति का दरवाजा बंद नहीं कर रहे।
क्यों लागू नहीं हो रहा मक्का समझौता? विशेषज्ञों का मानना है कि मक्का समझौता किसी साझा दुश्मन के खिलाफ नहीं बना है, जो कि किसी भी रक्षा संधि की पहली शर्त होती है। अरब सेंटर वॉशिंगटन डीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब के रणनीतिक हित अलग-अलग हैं। मिसाल के तौर पर, ईरान के साथ पाकिस्तान के जटिल संबंध और सऊदी अरब की अमेरिका पर निर्भरता इस गठबंधन को एक वास्तविक सैन्य ताकत बनने से रोकते हैं।
मुस्लिम नेटो का भ्रम पाकिस्तान के पूर्व राजदूत हुसैन हक्कानी ने स्पष्ट किया है कि यह गठबंधन प्रतीकात्मक ज्यादा है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि साझा दुश्मन के बिना जॉइंट डिफेंस संभव नहीं है। यह समझौता हथियारों के निर्माण और तकनीकी सहयोग तक तो सीमित रह सकता है, लेकिन इसे मुस्लिम नेटो के रूप में देखना एक बड़ी भूल होगी।
निष्कर्ष सऊदी अरब के लिए यह समझौता अमेरिका की सुरक्षा गारंटी का विकल्प नहीं, बल्कि एक अतिरिक्त सुरक्षा परत के रूप में है। हूतियों के ताजा हमलों ने यह साबित कर दिया है कि जब तक इन देशों के बीच कोई साझा दुश्मन या ठोस सैन्य प्रतिबद्धता नहीं बनती, तब तक यह समझौता केवल कागजों या भाषणों तक ही सीमित रहेगा। फिलहाल, हूती विद्रोही लगातार हमले कर रहे हैं और मक्का समझौता एक मूक दर्शक बना हुआ है।
مشترکہ دفاع عموما” مشترکہ دشمن کے خلاف ہوتا ہے۔ دشمن مشترک نہ ہو تو دفاعی تعاون تو ہو سکتا ہے، مشترکہ دفاع نہیں۔ پاکستان، ترکیہ اور سعودی عرب کے دشمن الگ الگ ہیں۔ اس معاہدہ کے نتیجہ میں وسائل اور دفاعی سازو سامان کی ساخت میں تعاون تو بڑھ سکتا ہے لیکن مسلم نیٹو نہیں بنے گی pic.twitter.com/wNDpz1Ugyc
— Husain Haqqani (@husainhaqqani) August 9, 2026
जस्टिस महेश चंद्र त्रिपाठी ने ली बॉम्बे हाई कोर्ट के 50वें चीफ जस्टिस के तौर पर शपथ
विवाद के बाद अफगान बोर्ड का यू-टर्न : भारत के नक्शे वाला वीडियो हटाया, अब नए दांव से मचाई हलचल
रीवा: क्या मोर्चरी में भी सुरक्षित नहीं हैं शव? कांग्रेस विधायक के सनसनीखेज दावे से मचा हड़कंप
उज्जैन: क्रेन और भारी मशीनें भी नहीं हिला पाईं 170 साल पुरानी हनुमान प्रतिमा, अब IIT इंदौर की टीम करेगी जांच
विजय माल्या का दावा: बैंकों ने वसूला पूरा कर्ज, फिर भी मुझे कहा जा रहा धोखेबाज
डेब्यू हो तो ऐसा! जॉर्डन हरमन ने पहले ही वनडे में बरपाया कहर, वर्ल्ड रिकॉर्ड की बराबरी कर मचाई सनसनी
उज्जैन: खड़े हनुमानजी के आगे फेल हुई आधुनिक तकनीक, अब IIT इंदौर सुलझाएगा रहस्य
चप्पल से पीटने के बयान पर बवाल: कर्नाटक के मंत्री एसएस मल्लिकार्जुन का वीडियो वायरल, BJP विधायक को दी गाली
पेट्रोल पंप पर चालक की जल्दबाजी बनी जानलेवा, कर्मचारी गंभीर रूप से घायल
लद्दाख में पर्यटन की रिकॉर्डतोड़ रफ्तार: 8 महीनों में ही टूटा पिछले साल का आंकड़ा