IAEA का ईरान पर कड़ा प्रहार: 20 साल में पहली बार UN सुरक्षा परिषद को रिपोर्ट, जानिए क्या है पूरा मामला
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ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में बुधवार को एक बड़ी कूटनीतिक हलचल देखने को मिली। संयुक्त राष्ट्र की परमाणु निगरानी संस्था, इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) के 35 सदस्यीय बोर्ड ऑफ गवर्नर्स ने ईरान के खिलाफ एक प्रस्ताव पारित किया है।

इस प्रस्ताव के तहत ईरान को सीधे तौर पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) को रिपोर्ट किया गया है। यह पिछले 20 वर्षों में पहली बार है जब ईरान के खिलाफ निगरानी संस्था ने इतना सख्त कदम उठाया है।

क्या है इस प्रस्ताव का आधार? यह कदम इस निष्कर्ष के बाद उठाया गया है कि ईरान परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने से जुड़ी अपनी अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियों का पालन नहीं कर रहा है। जांच में पाया गया कि ईरान उन जगहों पर मिले यूरेनियम के निशानों का संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे पाया है, जहां कथित तौर पर परमाणु गतिविधि की जा रही थी।

सुरक्षा परिषद में कार्रवाई की संभावना कम भले ही यह प्रस्ताव पारित हो गया हो, लेकिन सुरक्षा परिषद में इसके जरिए ईरान पर सख्त कार्रवाई होने की उम्मीद बहुत कम है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण रूस और चीन हैं, जो सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं और उनके पास वीटो का अधिकार है। माना जा रहा है कि ये दोनों देश ईरान के बचाव में खड़े हो सकते हैं।

ईरान का पलटवार: यह राजनीतिक और पक्षपाती है इस प्रस्ताव के पारित होने पर ईरान ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। तेहरान ने इसे बिना आम सहमति के पारित किया गया एक राजनीतिक और पक्षपाती प्रस्ताव करार दिया है।

ईरान के स्थायी मिशन का कहना है कि यह अमेरिका और इजरायल की आक्रामक नीतियों का नतीजा है। ईरान ने स्पष्ट किया कि दबाव या प्रतिबंधों के जरिए ईरानी राष्ट्र को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करने का अमेरिका का सपना कभी पूरा नहीं होगा।

वोटिंग का गणित और भविष्य की चुनौतियां IAEA की बंद कमरे में हुई बैठक में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी द्वारा पेश किए गए इस प्रस्ताव को 23 वोट मिले, जबकि 3 देशों (रूस, चीन और नाइजर) ने इसका विरोध किया। 8 देशों ने वोटिंग से दूरी बनाए रखी।

अब IAEA के डायरेक्टर जनरल को इस प्रस्ताव और ईरान की पिछली गतिविधियों की पूरी रिपोर्ट सुरक्षा परिषद और संयुक्त राष्ट्र महासभा को सौंपनी होगी। यह स्थिति न केवल ईरान और पश्चिमी देशों के बीच कूटनीतिक तनाव को बढ़ाएगी, बल्कि परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के भविष्य पर भी सवाल खड़े कर रही है।

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