9 मिनट बनाम 15 मिनट: सत्य निकेतन हादसे ने कैसे खोली दिल्ली के सरकारी एम्बुलेंस सिस्टम की पोल?
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दिल्ली के सत्य निकेतन में पांच मंजिला पीजी इमारत ढहने के बाद रेस्क्यू ऑपरेशन जोर-शोर से चल रहा था। पुलिस, फायर ब्रिगेड और आपदा राहत टीमों के बीच एक ऐसी तस्वीर सामने आई जिसने बड़े सवाल खड़े कर दिए। हादसे के कुछ ही मिनटों के भीतर निजी कंपनी ब्लिंकइट की एम्बुलेंस न केवल वहां पहुंची, बल्कि घायलों को प्राथमिक उपचार देकर अस्पताल भी पहुंचाया।

क्या 330 सरकारी एम्बुलेंस के होते हुए एक ऐप-आधारित निजी सेवा का तेज पहुंचना महज इत्तेफाक है, या फिर दिल्ली के सरकारी इमरजेंसी रिस्पॉन्स सिस्टम में कोई बड़ी खामी है?

9 मिनट का प्राइवेट वार और ढांचा

सत्य निकेतन हादसे में ब्लिंकइट की पहली एम्बुलेंस घटनास्थल पर बहुत जल्दी पहुंच गई थी। कंपनी का दावा है कि उनके पास दिल्ली-NCR में 63 एम्बुलेंस का बेड़ा है जिनका औसत रिस्पॉन्स टाइम 9 मिनट है। इन एम्बुलेंस में ऑक्सीजन से लेकर AED और वाइटल साइन मॉनिटरिंग जैसे जरूरी उपकरण मौजूद रहते हैं। सबसे अहम बात यह है कि ये एम्बुलेंस मोबाइल ऐप आधारित हैं, जो तुरंत नजदीकी अस्पताल चुनने और मरीज के साथ अस्पताल तक बने रहने की सुविधा देती हैं।

330 सरकारी एम्बुलेंस: आंकड़ों का मायाजाल

दिल्ली सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, CATS (Centralised Accident and Trauma Services) के पास 330 एम्बुलेंस का बड़ा बेड़ा है। इसमें एडवांस्ड लाइफ सपोर्ट (ALS) से लेकर बेसिक लाइफ सपोर्ट (BLS) तक की गाड़ियां शामिल हैं। हालांकि, सरकारी दस्तावेजों में औसत रिस्पॉन्स टाइम 15 मिनट से कम बताया गया है, लेकिन हकीकत में इन 330 गाड़ियों की ऑन-ग्राउंड उपलब्धता और ट्रेनिंग पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं।

158 करोड़ का बजट, फिर भी देरी क्यों?

दिल्ली सरकार कैड्स (CATS) के संचालन और मेंटेनेंस पर सालाना लगभग 158 करोड़ रुपये खर्च करती है। बावजूद इसके, इतनी बड़ी संख्या में गाड़ियां होने के बाद भी किसी बड़े हादसे में एक निजी कंपनी का पहले पहुंचना कई सवाल खड़ा करता है:

सरकारी सिस्टम की चुनौतियां: संख्या काफी नहीं है

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की रिपोर्ट भी मानती है कि भारत में समस्या सिर्फ एम्बुलेंस की संख्या की नहीं है। कई राज्यों में पुराने वाहन, प्रशिक्षित इमरजेंसी मेडिकल टेक्नीशियन (EMT) की कमी और GPS आधारित मॉनिटरिंग का न होना एक बड़ी समस्या है। सुप्रीम कोर्ट के सामने भी यह बात आ चुकी है कि कई राज्यों में एम्बुलेंस में GPS तक मौजूद नहीं हैं।

क्या निजी और सरकारी का हो सकता है एकीकरण ?

सत्य निकेतन की घटना कोई पहली बार नहीं है जब निजी क्षेत्र की दक्षता ने सरकारी सिस्टम को आईना दिखाया हो। सवाल यह नहीं है कि निजी एम्बुलेंस क्यों आई, बल्कि यह है कि सरकारी तंत्र अपनी 330 गाड़ियों के साथ उस दक्षता को क्यों नहीं छू पा रहा?

शायद अब समय आ गया है कि सरकार अपने सरकारी बेड़े को केवल संख्या बढ़ाने के बजाय, तकनीक, बेहतर डिस्पैच सिस्टम और निजी क्षेत्र की तरह स्पीड पर ध्यान केंद्रित करे। क्या दिल्ली की सड़कें और ट्रैफिक सरकारी और निजी एम्बुलेंस के लिए अलग हैं? जवाब है—नहीं। तो फिर फर्क सिर्फ मैनेजमेंट और इच्छाशक्ति का ही है।

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