महाराष्ट्र में आगामी नवरात्रि उत्सव के दौरान गरबा पंडालों में प्रवेश को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। विश्व हिंदू परिषद (VHP) और बजरंग दल ने गाइडलाइंस जारी कर गरबा पंडालों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाने की मांग की है।
संगठनों का कहना है कि प्रवेश के समय आधार कार्ड की जांच अनिवार्य हो और माथे पर तिलक लगाकर ही किसी को अंदर आने दिया जाए। इस मांग का समर्थन भाजपा विधायक नितेश राणे ने किया है, जबकि विपक्ष इसे नफरत फैलाने की साजिश बता रहा है।
गरबा केवल मनोरंजन का जरिया नहीं है, बल्कि यह मां शक्ति की उपासना का प्रतीक है। गरबा शब्द संस्कृत के गर्भ शब्द से निकला है। प्राचीन काल में, मिट्टी के एक छिद्रयुक्त घड़े के अंदर दीपक रखा जाता था, जिसे गर्भ-दीप कहा जाता था।
यह घड़ा मानव शरीर का और भीतर जलता दीपक आत्मा व शक्ति का प्रतीक माना जाता था। इसके चारों ओर गोल घेरा बनाकर नृत्य करना जीवन चक्र और ऊर्जा के सम्मान का प्रतीक है।
इतिहासकारों के अनुसार, गरबा की जड़ें गुजरात के गांवों में हैं। शुरुआत में यह देवी की पूजा के बाद ढोल, मंजीरा और तालियों की थाप पर किया जाने वाला एक सरल लोक नृत्य था। समय के साथ इसमें विभिन्न ताल और शैलियां जुड़ती गईं। कुछ विद्वान इसका संबंध हरिवंश पुराण में वर्णित दंड रसक और ताल रसक से जोड़ते हैं। सोलंकी और वाघेला राजवंशों के दौरान गुजरात में इस सामूहिक नृत्य परंपरा ने और अधिक मजबूती पकड़ी।
गरबा नवरात्रि के नौ दिनों तक चलता है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। गोल घेरे में नृत्य करना जन्म-मृत्यु के चक्र को दर्शाता है। पहले यह नृत्य मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा नारी शक्ति के सम्मान में किया जाता था। डांडिया, जो गरबा का ही एक हिस्सा है, उसमें उपयोग की जाने वाली छड़ियाँ देवी दुर्गा की तलवार का प्रतीक मानी जाती हैं।
आज गरबा गुजरात की सीमाओं को पार कर पूरे भारत और विदेशों में भी लोकप्रिय हो चुका है। अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी यह एक भव्य सांस्कृतिक उत्सव बन गया है। पहले यह विशुद्ध धार्मिक आयोजन था, लेकिन अब यह एक बड़े व्यावसायिक और सामाजिक उत्सव का रूप ले चुका है।
महाराष्ट्र में उपजे इस विवाद ने कानूनी और सामाजिक सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रश्न यह है कि क्या किसी निजी धार्मिक आयोजन में आधार कार्ड की जांच और धर्म के आधार पर प्रवेश निषेध करना संविधान के समानता के अधिकार के दायरे में आता है?
सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखना आयोजकों का अधिकार हो सकता है, लेकिन किसी समुदाय को संदेह की नजर से देखना सामाजिक तनाव को जन्म दे सकता है। फिलहाल, गरबा की मूल भावना लोगों को एक साथ जोड़ने की रही है। आयोजकों और प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि धार्मिक आस्था के सम्मान के साथ-साथ संविधान द्वारा प्रदत्त भाईचारे के मूल्यों का भी ध्यान रखा जाए।
#WATCH | Maharashtra | BJP MLA Nitesh Rane says, ...It is the demand of the entire Hindu community that when Navaratri begin and dandia will be played, participants should be from the Hindu community. We have received extensive information that cases of Love Jihad and… pic.twitter.com/HNGFm05NO9
— ANI (@ANI) October 10, 2023
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