पश्चिम बंगाल में आगामी नगर निकाय चुनावों से ठीक पहले सियासी पारा चढ़ गया है। भाजपा की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद शमिक भट्टाचार्य ने युवाओं (Gen-Z) और खान-पान से जुड़ी बंगाली संस्कृति पर पार्टी का स्पष्ट रुख रखते हुए राज्य की राजनीति में नया समीकरण पेश किया है।
युवाओं को अपनी बात रखने की आजादी कोलकाता में एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान शमिक भट्टाचार्य ने साफ किया कि भाजपा युवा पीढ़ी पर न तो अपनी कोई सोच थोपती है और न ही उन्हें किसी दायरे में बांधती है। उन्होंने कहा कि पार्टी आज की जेन-जी को पूरी आजादी देने में विश्वास रखती है, ताकि वे खुलकर अपने विचार व्यक्त कर सकें।
राष्ट्रवाद के साथ आगे बढ़ रही युवा पीढ़ी शमिक ने स्पष्ट किया कि भाजपा युवाओं को केवल एक वोट बैंक के रूप में नहीं देखती। उन्होंने कहा कि आज का युवा राष्ट्रवाद, देशभक्ति और देश के प्रति सम्मान की भावना से ओत-प्रोत है। भाजपा उन्हें समाज की मुख्यधारा का एक सशक्त हिस्सा मानती है और उनके इस राष्ट्रवादी दृष्टिकोण का पूरा सम्मान करती है।
खान-पान पर व्यक्तिगत पसंद का समर्थन हाल ही में नवरात्रों के दौरान मांसाहार को लेकर उपजे विवाद पर शमिक भट्टाचार्य ने खुलकर भाजपा का रुख स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि खान-पान पूरी तरह से एक व्यक्ति की अपनी पसंद है। बंगाली संस्कृति का हवाला देते हुए उन्होंने सवाल किया कि नवमी के दिन मछली या मांस खाने में बुराई क्या है?
संस्कृति थोपने का कोई अधिकार नहीं प्रदेश अध्यक्ष ने जोर देकर कहा कि किसी भी व्यक्ति या संगठन को दूसरों के थाली का फैसला करने का अधिकार नहीं है। उनके अनुसार, कोई मछली खाए, मांस खाए या पूर्णतः शाकाहारी रहे, यह उसका निजी निर्णय है। भाजपा इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता मानती है और इस पर किसी भी प्रकार की धार्मिक या सांस्कृतिक पाबंदी को सिरे से खारिज करती है।
क्या है सियासी मायने? राजनीतिक जानकारों का मानना है कि शमिक भट्टाचार्य के इस बयान के पीछे टीएमसी के उन आरोपों का जवाब देना है जिसमें भाजपा पर बंगाली संस्कृति विरोधी होने का तंज कसा जाता रहा है। निकाय चुनावों से ठीक पहले भाजपा ने खुद को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और बंगाली परंपरा का समर्थक बताकर युवाओं और उदारवादी मतदाताओं को साधने की कोशिश की है।
*What one eats or wears is a personal choice. Bengal’s food culture is diverse, and everyone has the freedom to follow their own preferences.
— BJP West Bengal (@BJP4Bengal) September 7, 2026
Bengalis won’t have fish or mutton? Even Swami Vivekananda approved of it. No saint, leader or anyone else has the right to decide what… pic.twitter.com/29fHCiLnXB
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