महाराष्ट्र: नवरात्रि गरबा में नो एंट्री पर घमासान, VHP के फरमान से गरमाई सियासत
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महाराष्ट्र में आगामी नवरात्रि के त्योहार को लेकर विश्व हिंदू परिषद (VHP) द्वारा जारी गाइडलाइंस ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। VHP ने गरबा और डांडिया कार्यक्रमों में मुसलमानों के प्रवेश पर रोक लगाने की मांग की है, जिस पर विपक्षी दलों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है।

VHP की शर्तें: आधार कार्ड और तिलक अनिवार्य VHP का तर्क है कि नवरात्रि कोई मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि देवी आराधना का पर्व है। संगठन ने आयोजकों से अपील की है कि वे गरबा स्थल पर आने वाले लोगों की पहचान सुनिश्चित करें। इसके तहत आधार कार्ड की जांच और माथे पर तिलक लगाना अनिवार्य करने जैसे सुझाव दिए गए हैं, ताकि केवल आस्था रखने वाले ही इन कार्यक्रमों में शामिल हों।

विपक्ष का हमला: ये देश की परंपरा है शिवसेना (UBT) नेता संजय राउत ने VHP पर निशाना साधते हुए उन्हें हिंदुओं का नया मौलवी करार दिया। उन्होंने कहा कि गरबा देश की सांस्कृतिक परंपरा है। राउत ने RSS प्रमुख मोहन भागवत के बयानों का जिक्र करते हुए पूछा कि जब भागवत विदेशों में हिंदू-मुस्लिम एकता की बात करते हैं, तो उनके ही संगठन के लोग भारत में इसके विपरीत काम क्यों कर रहे हैं?

हमें हिंदुत्व का सर्टिफिकेट न दें आदित्य ठाकरे ने भी कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि मुंबई में रहने वाले लोगों की पहली पहचान मुंबईकर है। उन्होंने सवाल किया कि ये लोग कौन होते हैं जो हमें हिंदुत्व का सर्टिफिकेट बांट रहे हैं? कांग्रेस और NCP (शरद गुट) ने भी इस फरमान को पूरी तरह असंवैधानिक बताया और इसे समाज को बांटने की कोशिश करार दिया।

BJP का बचाव: आस्था नहीं तो आने का मतलब क्या? विपक्ष के हमलों के बीच, भाजपा नेता राम कदम ने VHP का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि नवरात्रि पूरी तरह धार्मिक और सात्विक आयोजन है। राम कदम का कहना है, अगर किसी व्यक्ति की देवी मां में श्रद्धा या आस्था ही नहीं है, तो वहां उनकी मौजूदगी का कोई अर्थ नहीं है।

सुरक्षा का हवाला और छेड़खानी का मुद्दा भाजपा नेता ने तर्क दिया कि अक्सर ऐसे लोग गरबा पंडालों में आते हैं जो परंपरा का सम्मान नहीं करते, जिससे विवाद और छेड़खानी जैसी घटनाएं होती हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि सच्ची श्रद्धा वाले लोगों के लिए कोई रोक नहीं है, लेकिन आस्था की आड़ में शरारत करने वालों को रोकने के लिए ऐसे कदम जरूरी हैं।

यह मुद्दा अब महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया ध्रुवीकरण पैदा करता दिख रहा है, जहां एक तरफ इसे धार्मिक शुद्धता बताया जा रहा है, तो दूसरी तरफ विपक्ष इसे संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन मान रहा है।

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