दुनिया का नक्शा अब बदलेगा: 500 साल पुरानी गलती सुधारेगा UN का नया इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन
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संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने सितंबर 2026 में ऐतिहासिक फैसला लेते हुए करेक्ट द मैप प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। अब दुनिया को 16वीं सदी के पुराने नक्शे से मुक्ति मिलेगी और उसकी जगह इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन (Equal Earth Projection) लेगा, जो देशों और महाद्वीपों को उनके वास्तविक आकार में दिखाएगा।

क्यों फेल हुआ 500 साल पुराना मर्केटर मैप ?

दुनिया का वर्तमान नक्शा 1569 में जेरार्डस मर्केटर ने बनाया था। उस समय इसका उद्देश्य समुद्री नेविगेशन (Navigation) में नाविकों की मदद करना था। मर्केटर मैप में पृथ्वी को सपाट कागज पर दिखाने के चक्कर में आकार का संतुलन बिगड़ गया। इसमें भूमध्य रेखा (Equator) के पास के देशों को छोटा और ध्रुवों के पास के देशों को जरूरत से ज्यादा बड़ा दिखाया गया।

अफ्रीका के साथ हुआ सबसे बड़ा अन्याय

पुराने नक्शे की सबसे बड़ी खामी यह थी कि इसमें अफ्रीका और ग्रीनलैंड का आकार लगभग बराबर दिखाया गया, जबकि हकीकत में अफ्रीका, ग्रीनलैंड से 14 गुना ज्यादा बड़ा है। इसी तरह लैटिन अमेरिका और दक्षिण एशिया जैसे क्षेत्रों को भी उनके वास्तविक आकार से काफी छोटा दिखाया गया था। नए नक्शे में इस वैज्ञानिक त्रुटि को सुधार दिया गया है।

UN में वोटिंग: अफ्रीका का समर्थन, अमेरिका का विरोध

करेक्ट द मैप प्रस्ताव को टोगो समेत कई अफ्रीकी देशों ने पेश किया था। संयुक्त राष्ट्र में भारत समेत 164 देशों ने इसके समर्थन में मतदान किया। हालांकि, अमेरिका ने इस प्रस्ताव का विरोध किया है, जबकि 6 देशों ने मतदान से दूरी बनाए रखी। इसे वैश्विक स्तर पर अफ्रीका के प्रभाव और सही प्रतिनिधित्व की दिशा में एक बड़ी जीत माना जा रहा है।

भारत का रुख: समर्थन के साथ अपनी शर्तें

भारत ने नए मैप का समर्थन तो किया है, लेकिन विदेश मंत्रालय ने एक स्पष्ट चेतावनी भी दी है। भारत की आपत्ति जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के चित्रण को लेकर है। भारत का कहना है कि नए नक्शे में भारत को उसके आधिकारिक भौगोलिक सीमाओं के अनुरूप ही दिखाया जाना चाहिए। भारत ने साफ किया है कि देश के किसी भी हिस्से की गलत या भ्रामक तस्वीर बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

क्या बदल जाएगा दुनिया का भूगोल?

साफ कर दें कि नए नक्शे से देशों की अंतरराष्ट्रीय सीमाएं नहीं बदली हैं, बल्कि उन्हें देखने का नजरिया बदला है। महाद्वीपों के आकार में आए इस बदलाव से शैक्षणिक संस्थानों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर फैली भ्रांतियां दूर होंगी। अब दुनिया का नक्शा भौगोलिक रूप से अधिक सटीक और निष्पक्ष नजर आएगा।

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