सत्य निकेतन हादसा: सपनों का पीजी बना कब्रगाह, मलबे दबे जिंदगियों पर सियासत गर्म
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दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में शनिवार को एक दर्दनाक हादसा हुआ। 40-50 साल पुरानी पांच मंजिला इमारत ताश के पत्तों की तरह ढह गई। यहाँ रहने वाले छात्रों के लिए जो पीजी (PG) उनके भविष्य का ठिकाना था, वह पलक झपकते ही मलबे का ढेर बन गया।

मरम्मत का काम बना काल हादसे के वक्त इमारत के बेसमेंट में अवैध खुदाई और मरम्मत का काम चल रहा था। स्थानीय लोगों के अनुसार, इमारत की हालत पहले से ही जर्जर थी। जैसे ही मलबे का ढेर लगा, चारों तरफ चीख-पुकार मच गई। कई छात्र और मजदूर मलबे के नीचे दब गए। राहत और बचाव कार्य के लिए मौके पर 17 एंबुलेंस तैनात की गईं और घायलों को AIIMS ट्रॉमा सेंटर भेजा गया।

सिस्टम की लापरवाही का नतीजा घटनास्थल पर पहुंचे एनएसयूआई अध्यक्ष विनोद जाखड़ ने प्रशासनिक दावों की पोल खोल दी। उन्होंने आरोप लगाया कि हादसे के शुरुआती घंटों में न तो पुलिस थी और न ही एम्बुलेंस। छात्रों ने अपने साथियों को बचाने के लिए खुद हाथों से मलबा हटाया। उन्होंने इसे पीजी माफिया का कारनामा बताते हुए सिस्टम की विफलता करार दिया है।

मलबे पर शुरू हुई राजनीति इस दर्दनाक हादसे के बाद दिल्ली में सियासी तीर चलने लगे हैं। आम आदमी पार्टी के नेता सौरभ भारद्वाज ने एमसीडी, फायर और एसडीएम विभाग को भ्रष्टाचार में लिप्त बताते हुए इसे मगरमच्छों का खेल करार दिया। वहीं, भाजपा नेताओं ने इसे ट्रेजेडी हंटिंग करार देते हुए पलटवार किया है। नेताओं के इस शोर के बीच एक बड़ा सवाल यह है कि आखिर 50 साल पुरानी जर्जर इमारत में बेसमेंट खोदने की इजाजत किसने दी?

दोषियों पर कब गिरेगी गाज? प्रशासन ने जांच कमेटी गठित करने और मकान मालिक पर एफआईआर दर्ज करने का आश्वासन दिया है। मेयर प्रवेश वाही ने भी व्यवस्था में कमियां स्वीकार की हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर हादसे के बाद केवल जांच का खानापूर्ति ही एकमात्र समाधान है? जब तक अवैध निर्माण और रिश्वतखोरी के मगरमच्छों पर ठोस कार्रवाई नहीं होगी, तब तक दिल्ली के अन्य इलाकों में भी ऐसे हादसे होने का खतरा बना रहेगा।

खामोश मलबे के नीचे दबी उम्मीदें सत्य निकेतन की सड़कों पर अब सन्नाटा है, लेकिन मलबे के नीचे दबी जिंदगियां आज भी सिस्टम से जवाब मांग रही हैं। राहत कार्य जारी है और हर गुजरता मिनट परिजनों के लिए अग्निपरीक्षा जैसा है। प्रशासन मलबा साफ कर देगा और सुर्खियां बदल जाएंगी, लेकिन इस लापरवाही का खामियाजा भुगतने वाले परिवारों के लिए यह जख्म कभी नहीं भरेगा। क्या दिल्ली पुलिस और एमसीडी इस सामूहिक अपराध की जिम्मेदारी लेंगे?

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