नेहा बोरा का पटना बुलावा: क्या कॉकरोच गर्ल बिहार में फिर खड़ा करेंगी कोई बड़ा आंदोलन?
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बिहार की राजधानी पटना में एक बार फिर छात्र राजनीति की तपिश बढ़ती दिख रही है। आइसा (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा ने राज्य के GenZ (युवा पीढ़ी) को पटना आमंत्रित किया है। उनके इस आह्वान ने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है कि क्या राज्य में किसी नए बड़े आंदोलन की पटकथा लिखी जा रही है।

पटना में 6 सितंबर को शक्ति प्रदर्शन

नेहा बोरा 6 सितंबर को पटना पहुंच रही हैं। सुबह 11 बजे SK मेमोरियल हॉल में एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया है। नेहा ने सोशल मीडिया वीडियो के जरिए बिहार के युवाओं से भारी संख्या में जुटने की अपील की है। उनका तर्क है कि बिहार में शिक्षा, रोजगार और परीक्षा व्यवस्था की स्थिति बदतर हो चुकी है और अब बदलाव की आवाज उठाने का समय आ गया है।

क्यों चर्चा में है यह दौरा?

नेहा बोरा का नाम पिछले कुछ समय से बड़े आंदोलनों से जुड़ा रहा है। उन्होंने बिहार में छात्रों पर दर्ज मुकदमों, पेपर लीक और रोजगार के संकट को अपना मुख्य मुद्दा बनाया है। बिहार के युवाओं को लामबंद करने की उनकी यह कोशिश सीधे तौर पर सत्ता और शैक्षणिक संस्थानों की व्यवस्था को चुनौती देने के रूप में देखी जा रही है।

कौन हैं नेहा बोरा?

मूल रूप से उत्तराखंड से ताल्लुक रखने वाली नेहा बोरा का बचपन सिलीगुड़ी और अलग-अलग शहरों में बीता। DPS सिलीगुड़ी से स्कूली शिक्षा और दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक के बाद, उन्होंने अंबेडकर विश्वविद्यालय से एमए किया। वर्तमान में वह JNU के स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड एस्थेटिक्स से पीएचडी कर रही हैं। थिएटर और साहित्य में रुचि रखने वाली नेहा, शिक्षा को केवल डिग्री तक सीमित नहीं मानतीं।

कॉकरोच प्रोटेस्ट से 23 दिन के अनशन तक

नेहा बोरा की पहचान एक जुझारू युवा नेता के रूप में है। कॉकरोच प्रोटेस्ट जैसे अनूठे प्रदर्शनों से सुर्खियों में आने वाली नेहा ने हाल ही में जंतर-मंतर पर 23 दिनों तक भूख हड़ताल की थी। इस दौरान उनकी गिरती सेहत और राजनीतिक हस्तियों (जैसे राहुल गांधी और शबाना आजमी) का उनसे मिलने पहुंचना, उनके आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ले आया।

विवादों से नाता

हर सक्रिय छात्र नेता की तरह नेहा का सफर विवादों से भी मुक्त नहीं रहा है। जंतर-मंतर आंदोलन के दौरान लगे नारों और सोशल मीडिया पर चर्चित रहे कुछ विवादों के कारण उन्हें विरोधियों के निशाने पर भी आना पड़ा। हालांकि, आइसा का दावा है कि उनका संगठन पूरी तरह लोकतांत्रिक तरीके से छात्र हितों के लिए संघर्ष कर रहा है।

क्या पटना का यह कार्यक्रम महज एक बैठक होगा या बिहार में आने वाले किसी बड़े छात्र आंदोलन का आगाज? 6 सितंबर की सुबह SK मेमोरियल हॉल में जुटने वाली युवाओं की भीड़ इस सवाल का जवाब तय करेगी।

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