भारत में मानसून का नया और खतरनाक चेहरा: अब टू मच वेदर की मार झेल रहा देश
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भारत का मानसून बदल चुका है। अब यह सिर्फ कम या ज्यादा बारिश का खेल नहीं रह गया है, बल्कि एक अनिश्चित और हिंसक आपदा में तब्दील हो गया है। देश अब जिस संकट का सामना कर रहा है, उसे विशेषज्ञ टू मच वेदर (अत्यधिक और चरम मौसम) कह रहे हैं, जो जीवन और विकास के लिए गंभीर खतरा बन चुका है।

आंकड़ों का भ्रम और जमीनी हकीकत इस मानसून के आंकड़े विरोधाभासी हैं। अगस्त में सामान्य से 16 प्रतिशत कम बारिश हुई और सितंबर में भी औसत से कम रहने का अनुमान है। बावजूद इसके, देश के कई हिस्से जलमग्न हैं। असम में बाढ़ ने सब कुछ तबाह कर दिया, वहीं हिमाचल, उत्तराखंड और बिहार में नदियों का रौद्र रूप देखने को मिला। यह दिखाता है कि मासिक औसत एक बहुत ही भ्रामक पैमाना है।

अल्प समय में हिंसक बारिश का कहर समस्या बारिश की कुल मात्रा की नहीं, बल्कि उसके समय और तीव्रता की है। जब एक महीने की बारिश कुछ ही घंटों में गिर जाती है, तो शहर का जल निकासी तंत्र ध्वस्त हो जाता है। असम की हजारों हेक्टेयर फसल इसलिए बर्बाद नहीं हुई कि बारिश ज्यादा थी, बल्कि इसलिए कि वह बहुत कम समय में हिंसक रूप से बरसी। एक किसान को फसल के सटीक चरणों में पानी चाहिए, न कि सूखे के बाद अचानक आए बादलों के फटने से आई बाढ़।

ग्लेशियर और पहाड़ों का बढ़ता जोखिम हिमालय क्षेत्र अब और भी संवेदनशील हो गया है। नेपाल-चीन सीमा पर हाल ही में ग्लेशियर टूटने से आई तबाही ने चेतावनी दी है कि सिक्किम, हिमाचल और उत्तराखंड के ऊपर लटकी ग्लेशियर झीलें कभी भी बड़ा खतरा बन सकती हैं। यह आपदा नदी की बाढ़ की तुलना में कहीं अधिक तेज़ और विनाशकारी होती है। इसके लिए सीमाओं से परे एक साझा और रीयल-टाइम निगरानी प्रणाली की तत्काल आवश्यकता है।

विकास और आपदा का विरोधाभास एशिया दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में दोगुनी गति से गर्म हो रहा है। जलवायु परिवर्तन सीधे तौर पर हर आपदा का कारण नहीं है, लेकिन यह ज़मीनी स्थितियों को बदल देता है। गर्म हवा में अधिक नमी रुकती है, जो मूसलाधार बारिश का कारण बनती है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि हमारा बुनियादी ढांचा—सड़कें, सुरंगें और शहर—आज भी पुराने मौसम के हिसाब से बने हैं, जो आने वाले समय के चरम मौसम को झेलने में सक्षम नहीं होंगे।

समाधान की ओर कदम अब पुराने भरोसेमंद मानसून की धारणा को छोड़ना होगा। भारत को रिस्क-स्मार्ट बनने की जरूरत है। हमें केवल नदियों की नहीं, बल्कि ग्लेशियर झीलों की पूर्व चेतावनी प्रणाली बनानी होगी। जल निकासी तंत्र को अब औसत के बजाय बारिश की तीव्रता के आधार पर डिजाइन करना होगा। साथ ही, बाढ़ के मैदानों और अस्थिर ढलानों पर निर्माण पर सख्ती से रोक लगानी होगी।

अंत में, यह स्वीकार करने का समय है कि हम मानसून को नियंत्रित नहीं कर सकते, लेकिन उसके प्रभाव को कम करने के लिए अपनी तैयारियों को बदल सकते हैं। भारत को अपनी विकास योजनाओं में टू मच वेदर को केंद्र में रखना होगा, अन्यथा एक खराब दोपहर की बारिश भी राष्ट्रीय आपदा का रूप लेती रहेगी।

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