नेपाल-चीन सीमा पर ग्लेशियर का तांडव: 580 से ज्यादा मौतें, दूसरी बाढ़ का साया बरकरार
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नेपाल और चीन के सीमावर्ती क्षेत्रों में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ का रहस्य सुलझ गया है। वैज्ञानिकों और चीनी अधिकारियों के अनुसार, इस तबाही का मुख्य कारण नेपाल की ओर स्थित 5,140 मीटर की ऊंचाई वाले एक ग्लेशियर का अचानक टूटना था। इस हादसे ने न केवल भारी जनहानि की है, बल्कि एक नई आपदा का खतरा भी पैदा कर दिया है।

कैमरे में कैद हुआ ग्लेशियर का विनाशकारी पतन

चीन के शिजांग (Xizang) क्षेत्र के जिरोंग काउंटी में एक पर्यटक के कैमरे में ग्लेशियर के टूटने का मंजर कैद हो गया। फुटेज में साफ देखा जा सकता है कि कैसे विशाल बर्फ और चट्टानें अचानक नीचे की ओर गिरती हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह हिमस्खलन इतना शक्तिशाली था कि महज सात मिनट के भीतर चट्टान, बर्फ और मलबे का सैलाब 20 किलोमीटर नीचे स्थित जिरोंग पोर्ट तक पहुंच गया।

580 से ज्यादा मौतें, हजारों लापता

इस आपदा के बाद से राहत और बचाव कार्य जारी हैं, लेकिन कठिन भौगोलिक परिस्थितियों ने काम को बेहद चुनौतीपूर्ण बना दिया है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, नेपाल और तिब्बत में मरने वालों की संख्या 570-580 के पार पहुंच गई है। करीब 2,000 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। कई गांवों पर कीचड़ और मलबे की मोटी परत जमने के कारण बचाव दल वहां तक पहुंच नहीं पा रहे हैं।

क्यों आई यह विनाशकारी बाढ़?

विशेषज्ञ इसे महज मानसूनी बाढ़ नहीं, बल्कि ग्लेशियर से जुड़ी कैस्केडिंग आपदा मान रहे हैं। इसका क्रम कुछ इस तरह रहा:

  1. ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा अचानक टूटा (Ice-rock avalanche)।
  2. मलबा नदी के रास्ते में फंस गया, जिससे एक अस्थायी झील बन गई।
  3. जब प्राकृतिक बांध टूटा, तो पानी और मलबे का एक शक्तिशाली प्रवाह नीचे की बस्तियों पर कहर बनकर टूटा।

दूसरी बाढ़ का डर और चीन का अलर्ट

तबाही के तीन दिन बाद भी खतरा टला नहीं है। चीन ने नेपाल को चेतावनी दी है कि ग्लेशियर के मलबे से बनी एक अस्थिर झील का जलस्तर खतरनाक रूप से बढ़ रहा है। यदि यह प्राकृतिक बांध अचानक टूटता है, तो नदी में 500 घन मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से पानी का प्रवाह फिर से निचले इलाकों में तबाही मचा सकता है। प्रशासन ने झील की निगरानी बढ़ा दी है।

जलवायु परिवर्तन और हिमालय का बदलता स्वरूप

वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण बर्फ के पहाड़ अंदर से खोखले हो रहे हैं। तापमान बढ़ने से ग्लेशियर का संतुलन बिगड़ रहा है, जिससे ये अचानक धरासाई हो रहे हैं। यह आपदा हिमालयी देशों के लिए एक गंभीर चेतावनी है। अब सैटेलाइट निगरानी और अर्ली वार्निंग सिस्टम को मजबूत करना समय की सबसे बड़ी मांग बन गया है, ताकि ऐसी अनहोनी को भविष्य में टाला जा सके।

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