FCRA संशोधन पर अमेरिकी टिप्पणी का भारत का कड़ा प्रहार: कहा- यह हमारा आंतरिक मामला, दखल बर्दाश्त नहीं
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विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) में प्रस्तावित संशोधनों को लेकर अमेरिका की ओर से आई अनावश्यक टिप्पणी पर भारत ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि भारत की विधायी प्रक्रिया पूरी तरह से उसका अपना आंतरिक विषय है।

क्या कहा विदेश मंत्रालय ने? विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने अमेरिकी सांसद की टिप्पणी को खारिज करते हुए कहा, हमने FCRA पर की गई टिप्पणियां देखी हैं। भारत से जुड़े विधायी मामले पूरी तरह से हमारे आंतरिक विषय हैं और इन पर निर्णय लेने का एकमात्र अधिकार हमारी संसद को है।

भारत ने आईना दिखाते हुए यह भी स्पष्ट कर दिया कि विदेशी फंड के प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए कड़े कानून केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अमेरिका सहित दुनिया के कई अन्य लोकतांत्रिक देशों में भी प्रभावी हैं।

अमेरिकी सांसद ने क्या दिया था बयान? यह विवाद तब शुरू हुआ जब रिपब्लिकन पार्टी के अमेरिकी सांसद राइली मूर ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर प्रस्तावित FCRA संशोधन की सार्वजनिक आलोचना की। मूर ने दावा किया कि ये बदलाव भारत में ईसाई समुदाय और चर्च से जुड़े संस्थानों पर नकारात्मक असर डाल सकते हैं। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि ऐसे कदम भारत-अमेरिका संबंधों को प्रभावित कर सकते हैं।

क्या है FCRA विवाद की जड़? केंद्र सरकार ने संसद के मानसून सत्र के दौरान FCRA, 2010 में संशोधन का प्रस्ताव रखा है। यह कानून निर्धारित करता है कि NGO, धार्मिक संस्थान, स्कूल और चैरिटेबल ट्रस्ट विदेशी फंड कैसे प्राप्त करेंगे और उसका उपयोग कैसे होगा।

विपक्षी दलों और कुछ एनजीओ का आरोप है कि ये संशोधन सरकार को विदेशी फंड पर निर्भर संस्थाओं पर अत्यधिक नियंत्रण देने के लिए लाए जा रहे हैं। वहीं, कुछ धार्मिक संगठनों को डर है कि पंजीकरण नवीनीकरण की सख्त शर्तों से उनके द्वारा संचालित स्कूल और अस्पताल प्रभावित हो सकते हैं।

भारत सरकार का पक्ष केंद्र सरकार का तर्क है कि FCRA संशोधनों का मुख्य उद्देश्य विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता और जवाबदेही लाना है। सरकार का स्पष्ट मानना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सुशासन के लिए विदेशी धन के प्रवाह की निगरानी करना एक संप्रभु राष्ट्र का अधिकार है।

इस दो-टूक जवाब के साथ भारत ने स्पष्ट संदेश दे दिया है कि देश की लोकतांत्रिक विधायी प्रक्रिया में किसी भी विदेशी हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं किया जाएगा।

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