मानसून सत्र का 15वां दिन भी हंगामे की भेंट चढ़ गया। संसद के दोनों सदनों को सोमवार सुबह 11 बजे तक के लिए स्थगित कर दिया गया है। 20 जुलाई से शुरू हुए इस सत्र में अब तक दोनों सदनों ने कुल मिलाकर 39 घंटे से भी कम काम किया है। लोकतंत्र के इस मंदिर में जहाँ बहस और कानून निर्माण होना चाहिए था, वहां आज सन्नाटा या सिर्फ शोर सुनाई दे रहा है।
संसद का संचालन एक बेहद खर्चीली प्रक्रिया है। इसमें सुरक्षा, सचिवालय, तकनीकी सुविधाएं, अनुवाद और स्टाफ का वेतन शामिल है। साल 2012 के एक आधिकारिक अनुमान के मुताबिक, संसद की कार्यवाही का खर्च लगभग 2.5 लाख रुपये प्रति मिनट आता है। यानी लोकसभा और राज्यसभा, दोनों का मिलाकर हर मिनट 2.5 लाख रुपये खर्च होते हैं। अगर आज बढ़े हुए वेतन और महंगाई को जोड़ें, तो यह आंकड़ा और भी अधिक हो सकता है।
संसदीय नियमों के अनुसार, संसद की बैठक आमतौर पर रोजाना 6 घंटे की होती है। इस गणित से 15 दिनों में दोनों सदनों को कुल 180 घंटे काम करना चाहिए था। हालांकि, पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के आंकड़े चौंकाने वाले हैं:
संसद ठप होने का नुकसान केवल आर्थिक नहीं है। इसका असली असर लोकतांत्रिक नींव पर पड़ता है:
पूर्व उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने अपने कार्यकाल के दौरान स्पष्ट किया था कि संसद ठप करना किसी सांसद का विशेषाधिकार नहीं है। संसदीय कामकाज पर नजर रखने वाली संस्था पीआरएस का भी मानना है कि जब सदन हंगामे की भेंट चढ़ता है, तो लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी— विधेयकों की जांच —खत्म हो जाती है।
पिछले 20 वर्षों में संसद की उत्पादकता में लगातार गिरावट आई है। 1978 से 1996 के बीच जहां उत्पादकता 100% से अधिक रहती थी, वहीं अब यह 65-70% के स्तर तक लुढ़क गई है। सवाल यह है कि यदि देश के सर्वोच्च नीति-निर्धारक ही चर्चा की जगह गतिरोध को चुनेंगे, तो आम नागरिक अपनी समस्याओं के समाधान के लिए कहाँ जाएगा?
🔴#BREAKING| राज्यसभा का सत्र एक बार फिर हंगामे की भेंट चढ़ा, सोमवार तक के लिए स्थगित#MonsoonSession | @DeoSikta | @Rajeevranjantv pic.twitter.com/BWGgbjyeuF
— NDTV India (@ndtvindia) August 7, 2026
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