क्या 2,000 रुपये से अधिक के UPI पेमेंट पर लगेगा शुल्क? संसद में पेश संशोधन से बढ़ी हलचल
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सरकार ने संसद में पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट में संशोधन का प्रस्ताव पेश किया है। इस कदम ने देश भर में चर्चाओं और विरोध का बाजार गर्म कर दिया है। जानकारों का मानना है कि यह बदलाव UPI लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) को दोबारा लागू करने की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है।

MDR क्या है और इसका असर? MDR वह शुल्क है जो डिजिटल पेमेंट पूरा होने पर कारोबारी, बैंक और पेमेंट कंपनियों को देते हैं। अभी तक UPI लेनदेन पर व्यापारियों से कोई MDR नहीं लिया जाता है, जिससे यह आम लोगों और छोटे दुकानदारों के बीच बेहद लोकप्रिय है। प्रस्तावित संशोधन इसी शुल्क को वसूलने का कानूनी आधार तैयार करेगा।

राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया विपक्ष ने इस कदम को सीधे तौर पर आम जनता की जेब पर हमला करार दिया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि सरकार 2,000 रुपये से अधिक के भुगतान पर शुल्क वसूलने की योजना बना रही है। सोशल मीडिया पर भी जनता इस बात को लेकर चिंतित है कि अगर UPI पर शुल्क लगा, तो लोग फिर से कैश (नकदी) के इस्तेमाल की ओर मुड़ सकते हैं।

बीजेपी सांसद का रुख बीजेपी सांसद और कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स के महासचिव प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि फिलहाल विधेयक के प्रावधान आने का इंतजार करना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि अगर सरकार कोई बदलाव ला रही है, तो उसके पीछे तार्किक कारण होंगे। उन्होंने यह भी कहा कि 2,000 रुपये तक के लेनदेन को छूट दी गई है ताकि आम आदमी पर बोझ न पड़े।

क्या है लागत का गणित? आंकड़ों के अनुसार, UPI सिस्टम को बनाए रखने की लागत प्रति लेनदेन 0.4 से 1 रुपये के बीच आती है। वहीं, कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि UPI मुफ्त रहने से सरकार को मुद्रा छापने और कैश मैनेजमेंट में हजारों करोड़ रुपये की बचत हो रही है। इसलिए, शुल्क लगाने से डिजिटल भुगतान की रफ्तार धीमी होने का खतरा बना हुआ है।

आगे क्या होगा? अभी यह तय नहीं है कि शुल्क कितना होगा या किन ट्रांजेक्शन पर लागू होगा। बैंकिंग और डिजिटल इकोसिस्टम के जानकारों का मानना है कि यदि शुल्क लगाया जाता है, तो अंततः इसका भार उपभोक्ताओं पर ही पड़ेगा। सरकार के सामने अब यह चुनौती है कि डिजिटल क्रांति की सफलता को बरकरार रखते हुए सिस्टम के वित्तीय बोझ को कैसे संतुलित किया जाए।

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