कलयुग का क्रूर सच: पिता के अंतिम संस्कार के वक्त बेटी पूछती रही— अभी और कितनी देर लगेगी, हमें खाना खाना है
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सोनीपत के एक ओल्ड-एज होम से रिश्तों के खोखलेपन और आधुनिक समाज की संवेदनहीनता को दर्शाने वाली एक हृदयविदारक घटना सामने आई है। पूर्व व्यापारी शिवचरण राम रतन गुप्ता ने अपनी पूरी जिंदगी अपनी तीन बेटियों को काबिल बनाने में लगा दी, लेकिन उनके अंतिम समय में वे मौजूद नहीं थीं।

तीनों बेटियां—जो नेपाल, उत्तर प्रदेश और मुंबई में बसी हैं—अंतिम संस्कार के लिए सोनीपत नहीं पहुंचीं। उन्होंने अपने पिता के अंतिम संस्कार को वीडियो कॉल पर देखा और 5,100 रुपये भेजकर अपना फर्ज इतिश्री कर लिया।

अंतिम विदाई में भी जल्दबाजी ओल्ड-एज होम के मैनेजमेंट के अनुसार, जब बेटियों को पिता की मृत्यु की सूचना दी गई, तो उन्होंने आने में असमर्थता जताई। वीडियो कॉल के दौरान एक बेटी ने संवेदनहीनता की हद पार करते हुए पूछा, इसमें अभी और कितना समय लगेगा? हमें खाना खाना है और नहाना भी है। यह शब्द रिश्तों की कड़वी सच्चाई को बयां करने के लिए काफी थे।

पिता ने दी थी बेहतरीन परवरिश शिवचरण गुप्ता ने अपनी बेटियों की परवरिश में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। उनकी दो बेटियां टीचर हैं। पिछले दो सालों से वह अपनी पत्नी के निधन के बाद ओल्ड-एज होम में रह रहे थे। मैनेजमेंट के मुताबिक, उन्हें अपनी बेटियों की कामयाबी पर बहुत गर्व था, लेकिन उनकी मौत से 20 दिन पहले जब बेटियों को उनकी बिगड़ती सेहत के बारे में बताया गया, तो भी उनमें से कोई मिलने नहीं आई।

अस्थियों के विसर्जन के लिए भी नहीं मिला वक्त मैनेजमेंट ने जब बेटियों से पूछा कि क्या वे अस्थियां लेने आएंगी, तो उन्होंने साफ मना कर दिया। उन्होंने ओल्ड-एज होम से ही गुजारिश की कि वे अस्थियों को गंगा में विसर्जित कर दें। उनके पास अपने पिता के अंतिम संस्कार के लिए शहर आने तक का समय नहीं था।

आंखें दान कर दी गईं इस पूरी घटना के बीच एकमात्र सकारात्मक पहलू यह रहा कि परिवार की सहमति से शिवचरण गुप्ता की आंखें दान कर दी गईं। मौत के बाद भी उनकी आंखें किसी जरूरतमंद के काम आ सकेंगी। अंततः, ओल्ड-एज होम के स्टाफ और स्थानीय लोगों ने ही एक पिता को अंतिम विदाई दी।

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