राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में स्थित मानगढ़ धाम एक बार फिर राजनीतिक सुर्खियों में है। आदिवासी समाज इस ऐतिहासिक स्थल को राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा दिए जाने की अपनी पुरानी मांग पर अड़ गया है। केंद्र सरकार द्वारा पूर्व में इस मांग को खारिज किए जाने के बाद से समुदाय में भारी आक्रोश है।
सांसदों का सरकार पर सीधा हमला भारत आदिवासी पार्टी (BAP) के सांसद राजकुमार रोत और कांग्रेस के पूर्व सांसद ताराचंद भगोरा ने वीडियो संदेश जारी कर सरकार को घेरा है। रोत ने सरकार के उस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें केंद्र ने मानगढ़ को पुरातात्विक प्रामाणिकता के अभाव में राष्ट्रीय स्मारक न बनाने की बात कही थी। उन्होंने इसे 1,500 से अधिक भील आदिवासियों के बलिदान का अपमान करार दिया है।
वादों की धरातल पर परीक्षा कांग्रेस नेता ताराचंद भगोरा ने याद दिलाया कि वर्ष 2022 में प्रधानमंत्री के मानगढ़ दौरे के दौरान राष्ट्रीय स्मारक बनाने का भरोसा दिया गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि यह केवल एक राजनीतिक वादा बनकर रह गया है। अब चुनावी माहौल के बीच, ये नेता सरकार पर दबाव बना रहे हैं कि वे अपने वादों को हकीकत में बदलें।
आदिवासियों का जलियांवाला बाग 17 नवंबर 1913 को गोविंद गुरु के नेतृत्व में मानगढ़ की पहाड़ियों पर जो नरसंहार हुआ था, वह भारतीय इतिहास का एक काला अध्याय है। इसे आदिवासियों का जलियांवाला बाग कहा जाता है। आदिवासी नेताओं का कहना है कि यह स्थल केवल एक धार्मिक स्थान नहीं, बल्कि उनके स्वाभिमान और ब्रिटिश-सामंती व्यवस्था के विरुद्ध लड़ी गई लड़ाई का प्रतीक है।
पर्यटन और विकास की उम्मीद आदिवासी समाज का मानना है कि यदि मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा मिलता है, तो न केवल शहीदों को यथोचित सम्मान मिलेगा, बल्कि इस क्षेत्र में पर्यटन गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलेगा। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और पिछड़े आदिवासी अंचलों का विकास हो सकेगा।
सरकार की चुप्पी पर सवाल फिलहाल, इस मुद्दे पर केंद्र या राज्य सरकार की ओर से कोई नई प्रतिक्रिया नहीं आई है। जैसे-जैसे राजस्थान में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो रही हैं, मानगढ़ धाम का मुद्दा आदिवासी वोट बैंक और अस्मिता से जुड़ता जा रहा है। अब देखना यह है कि क्या भविष्य में सरकार इस मांग पर अपना रुख स्पष्ट करेगी या यह मांग केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहेगी।
*केंद्र सरकार ने मानगढ़ धाम को पुरातात्विक प्रामाणिकता और अखंडता न रखने का हवाला देकर अंग्रेजी-सामंती व्यवस्था के विरुद्ध शहीद हुए 1,500 से अधिक भील आदिवासियों के बलिदान का अपमान किया है।
— Rajkumar Roat (@roat_mla) August 4, 2026
इससे राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र के आदिवासी समाज की भावनाओं को भी गहरी ठेस… pic.twitter.com/Y5BwyG0HH6
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