दतिया उपचुनाव: हार के बाद CM मोहन यादव का बड़ा बयान, नरोत्तम मिश्रा की नाराजगी बनी BJP के लिए चुनौती
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मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने बड़ी जीत हासिल की है। कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने भाजपा के आशुतोष तिवारी को करीब 6 हजार मतों के अंतर से शिकस्त दी है। इस परिणाम पर मुख्यमंत्री मोहन यादव ने पहली प्रतिक्रिया दी है।

पिछले चुनाव से बढ़े हैं हमारे वोट हार के बावजूद मुख्यमंत्री मोहन यादव ने सकारात्मक पक्ष रखा। उन्होंने कहा, यह सीट पहले भी कांग्रेस के पास थी और अब भी उन्हीं के पास गई है। गौर करने वाली बात यह है कि पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में इस बार हमें 1700 वोट अधिक मिले हैं। यह जनता का लोकतंत्र पर अटूट भरोसा है।

लोकतांत्रिक जनादेश का सम्मान मोहन यादव ने कहा कि बीजेपी ने राज्य की सभी 29 लोकसभा सीटें जीतकर इतिहास रचा है। उन्होंने हार को स्वीकार करते हुए कहा, लोकतंत्र में चुनाव का उद्देश्य जनता के सामने विचार रखना होता है। हमने अपना पक्ष रखा, कांग्रेस ने अपना। हम जनता के जनादेश को सिर झुकाकर स्वीकार करते हैं और भविष्य के चुनावों के लिए और अधिक जोश के साथ तैयारी करेंगे।

नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटना पड़ा भारी? राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि भाजपा की हार का सबसे बड़ा कारण पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटना रहा। 6 बार के विधायक रहे मिश्रा को टिकट न मिलने से पार्टी के भीतर गहरी नाराजगी थी। टिकट कटने के बाद उनके समर्थकों ने हाईवे जाम किया, आगजनी और तोड़फोड़ की, जिसमें पुलिसकर्मी भी घायल हुए थे। हालांकि, बाद में नरोत्तम मिश्रा ने आशुतोष तिवारी के समर्थन की अपील की थी, लेकिन तब तक डैमेज कंट्रोल मुश्किल हो गया था।

स्थानीय मुद्दों पर कांग्रेस की जीत कांग्रेस की इस जीत का श्रेय उनके स्थानीय एजेंडे को दिया जा रहा है। पार्टी ने अपने अभियान को बेरोजगारी, अनियमित वर्षा, खाद की किल्लत और किसानों की समस्याओं पर केंद्रित रखा। साथ ही, कांग्रेस ने भाजपा के भीतर मौजूद असंतोष का पूरा फायदा उठाया।

BJP ने झोंकी थी पूरी ताकत बीजेपी ने इस चुनाव को अपनी साख का सवाल बना लिया था। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने खुद प्रचार की कमान संभाली थी। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल से लेकर उप-मुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा और कई मंत्रियों को जीत सुनिश्चित करने के लिए दतिया में डेरा डालना पड़ा था। बावजूद इसके, आंतरिक गुटबाजी और स्थानीय नाराजगी के चलते सत्ताधारी दल को यह महत्वपूर्ण सीट गंवानी पड़ी।

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