नासिक में सियासी उबाल: गड्ढों के बहाने छगन भुजबल को पालक मंत्री बनाने की मांग तेज
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महाराष्ट्र के नासिक में मानसून की बारिश के बीच राजनीति का पारा अपने चरम पर है। शहर की बदहाल सड़कों और गड्ढों के कारण हो रही मौतों ने अब एक बड़ा राजनीतिक मोड़ ले लिया है। राष्ट्रवादी युवक कांग्रेस ने सड़कों पर उतरकर छगन भुजबल को जिले का पालक मंत्री बनाने की मांग के साथ मोर्चा खोल दिया है।

शहर भर में लगे आक्रामक बैनर नासिक के प्रमुख इलाकों जैसे गंगापुर नाका, सिटी सेंटर मॉल, माईको सर्कल और चांडक सर्कल पर लगे पोस्टरों ने सबका ध्यान खींचा है। इन बैनरों में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से सीधे अपील की गई है। पोस्टरों पर लिखा है, दत्तक नासिक के अभिभावक-मुख्यमंत्री, भुजबल साहब को पालक मंत्री बनाकर नासिक को गड्ढों से बाहर निकालें।

गड्ढों से गई पांच जानें, जनता में भारी रोष सड़कों की खराब स्थिति अब जानलेवा साबित हो रही है। रिपोर्टों के अनुसार, नासिक में सड़कों के गड्ढों के चलते अब तक पांच लोगों की जान जा चुकी है। आम जनता में प्रशासनिक सुस्ती को लेकर गहरा आक्रोश है। राष्ट्रवादी युवक कांग्रेस का तर्क है कि नासिक को अब एक ऐसे अनुभवी नेता की जरूरत है, जिसकी प्रशासन पर मजबूत पकड़ हो।

गिरीश महाजन के वर्चस्व को चुनौती? सियासी गलियारों में चर्चा है कि यह मांग केवल जनहित का मुद्दा नहीं, बल्कि सत्ता संघर्ष का हिस्सा है। राजनीतिक विशेषज्ञ इसे वर्तमान पालक मंत्री गिरीश महाजन के वर्चस्व को सीधी चुनौती के रूप में देख रहे हैं। हाल ही में छगन भुजबल ने नासिक की स्थिति पर तीखी टिप्पणी करते हुए महाजन को उनके कर्तव्यों की याद दिलाई थी।

दत्तक नासिक का वादा और फडणवीस पर दबाव पिछले चुनाव में देवेंद्र फडणवीस ने नासिक को गोद लेने का वादा किया था। अब इसी वादे को ढाल बनाकर पार्टी के वरिष्ठ नेता के समर्थकों ने फडणवीस पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। राष्ट्रवादी युवक कांग्रेस के अध्यक्ष अंबादास खैरे का स्पष्ट कहना है कि नासिक को अब प्रशासनिक ढिलाई बर्दाश्त नहीं है।

क्या बदलेगी नासिक की सत्ता की चाबी? एक ओर गिरीश महाजन ने गड्ढे भरने के लिए एक सप्ताह का अल्टीमेटम दिया है, तो दूसरी ओर भुजबल के समर्थकों की मांग ने सत्ता के गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। क्या मुख्यमंत्री इस मांग को मानकर भुजबल को कमान सौंपेंगे, या यह केवल आगामी चुनावों की बिसात बिछाने की एक कोशिश है? नासिक का सियासी भविष्य फिलहाल इन्हीं सवालों के इर्द-गिर्द घूम रहा है।

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