पक्का घर तक नहीं, लेकिन कॉमनवेल्थ में जीता पदक; गोल्डन स्कोर तक लड़ने वाली सागर की यामिनी ने रचा इतिहास
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सागर, मध्य प्रदेश: कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में 57 किलोग्राम वर्ग में जूडो में रजत पदक जीतकर मध्य प्रदेश की बेटी यामिनी मौर्य ने न केवल सागर का, बल्कि पूरे देश का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है। आज उनके गांव में जश्न का माहौल है, लेकिन इस सफलता की चमक के पीछे कई वर्षों का कड़ा संघर्ष और त्याग छिपा है।

अभावों में पले सपने यामिनी का परिवार सागर के पुरानी सदर क्षेत्र में एक दो कमरों के कच्चे मकान में रहता है। पिता हरिओम मौर्य एक साधारण किसान हैं। चार भाई-बहनों में तीसरे नंबर की यामिनी ने सरकारी स्कूल से पढ़ाई की है। घर की आर्थिक तंगी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज भी उनके पास अपना पक्का मकान नहीं है, लेकिन यामिनी के इरादे बेहद मजबूत थे।

मां ने बेचे गहने, पिता ने सहे ताने एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए खेल का सफर आसान नहीं था। यामिनी की बहन शैली मौर्य ने बताया कि जब भी यामिनी को राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए बाहर जाना होता था, तो आर्थिक समस्या आड़े आ जाती थी। ऐसे कठिन समय में मां ने अपने गहने गिरवी रखे और कई बार उन्हें बेच भी दिया ताकि बेटी की ट्रेनिंग और यात्रा का खर्च निकल सके।

समाज के दबाव का आलम यह था कि लोग पिता को ताने देते थे कि बेटी को जूडो-कराटे सिखाने के बजाय उसकी शादी कर दें। लेकिन पिता हरिओम मौर्य ने समाज की परवाह न करते हुए बेटी के सपनों को अपनी जिम्मेदारी समझा और हमेशा उसे खेलने के लिए प्रेरित किया।

सरकार से मिला सम्मान और प्रोत्साहन यामिनी की इस ऐतिहासिक जीत पर मध्य प्रदेश सरकार ने बड़ा ऐलान किया है। राज्य सरकार की ओर से यामिनी को सरकारी नौकरी और 25 लाख रुपये की पुरस्कार राशि देने की घोषणा की गई है। इस घोषणा से परिवार में खुशी की लहर है।

पिता का संदेश: बेटियों पर करें भरोसा अपनी बेटी की कामयाबी पर पिता हरिओम मौर्य कहते हैं, मैंने हमेशा यामिनी पर भरोसा किया और उसे पूरी आजादी दी। बेटियां किसी भी क्षेत्र में बेटों से कम नहीं हैं। यदि उन्हें परिवार का सहयोग और सही अवसर मिले, तो वे देश का नाम दुनिया में रोशन कर सकती हैं।

आज यामिनी मौर्य का संघर्ष उन सभी के लिए मिसाल है, जो विपरीत परिस्थितियों के कारण अपने सपनों को छोड़ देते हैं। एक किसान की बेटी ने साबित कर दिया कि पक्के घर से ज्यादा, इरादों का पक्का होना जरूरी है।

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