उदारता और क्षमा भारतीय संस्कृति के मूल स्तंभ हैं। हाल ही में जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन के दौरान Gen-Z के कुछ युवाओं ने प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ अमर्यादित भाषा का उपयोग कर विरोध की सभी सीमाएं लांघ दी थीं। हालांकि, प्रधानमंत्री ने एक बड़ा दिल दिखाते हुए इन युवाओं को गुमराह बताते हुए सार्वजनिक रूप से माफ कर दिया है। लेकिन यह घटना एक गंभीर सामाजिक सवाल खड़ा करती है।
जंतर-मंतर पर जो कुछ हुआ, उसने पूरे देश को सांस्कृतिक शॉक (Cultural Shock) दिया। जिस समाज में बेटियों को सभ्यता की प्रतिमूर्ति माना जाता है, वहां सार्वजनिक रूप से अपशब्दों का प्रयोग चिंताजनक है। यह केवल एक राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि हमारे भाषाई संस्कारों के क्षरण का प्रतीक है। आखिर युवा पीढ़ी इस हद तक कैसे भटक गई?
विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे बदलते पारिवारिक ढांचे का बड़ा हाथ है। कांतार (Kantar) के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में 50% परिवार न्यूक्लियर हो गए हैं। संयुक्त परिवारों के बिखराव के कारण बच्चों को घर के बड़ों से मिलने वाले संस्कार और मार्गदर्शन का अवसर कम हो गया है। शहरी परिवारों में माता-पिता बच्चों के साथ औसतन सिर्फ 2 घंटे बिताते हैं, जिससे संवाद की कमी गहरी हो गई है।
LocalCircles की रिपोर्ट के अनुसार, 9 से 17 साल के बच्चे रोजाना 3 घंटे से अधिक समय ऑनलाइन बिताते हैं। सोशल मीडिया और OTT प्लेटफॉर्म्स पर परोसी जाने वाली आक्रामक और अपमानजनक भाषा को रियल बताकर ग्लोरिफाई किया जा रहा है, जिसका सीधा प्रभाव Gen-Z के व्यवहार पर पड़ रहा है। डिजिटल स्क्रीन अब बच्चों के लिए एक ऐसी पाठशाला बन गई है जहां से उन्हें संस्कार नहीं, बल्कि आक्रामकता सीखने को मिल रही है।
अच्छी बात यह है कि गुस्से का उबाल ठंडा होने के बाद, कई युवा अब अपनी गलती स्वीकार कर रहे हैं। कई प्रदर्शनकारियों ने वीडियो जारी कर माफी मांगी है। यह इस बात का संकेत है कि गलती का एहसास होना, सुधार की दिशा में पहला कदम है। हालांकि, कुछ लोग अब भी इस अमर्यादित भाषा का बचाव कर रहे हैं, जो एक गलत मिसाल है। विरोध करना अधिकार है, लेकिन विरोध में मर्यादा बनाए रखना हमारी जिम्मेदारी।
एक तरफ राहुल गांधी युवाओं की स्वतंत्रता की बात करते हैं, वहीं दूसरी तरफ कर्नाटक में उनकी ही पार्टी की सरकार राहुल गांधी के खिलाफ टिप्पणी करने वाले युवाओं पर FIR दर्ज कर रही है। यह स्थिति सवाल खड़े करती है कि क्या कांग्रेस का बड़ा दिल सिर्फ दिल्ली तक सीमित है?
अंततः, स्वतंत्रता कोई बेलगाम अधिकार नहीं है, बल्कि एक गंभीर जिम्मेदारी है। जैसा कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवल ने भी कहा, आजादी का मतलब मनमर्जी नहीं, बल्कि राष्ट्रहित में सोचना है। भविष्य के भारत को गढ़ने के लिए युवाओं को यह समझना होगा कि अच्छी भाषा और अच्छा व्यवहार ही सफलता का मार्ग है।
#DNAमित्रों | पीएम ने गालीबाजों को माफ किया.. देश करेगा?
— Zee News (@ZeeNews) August 1, 2026
कुछ बच्चे भटक रहे हैं, इसके लिए जिम्मेदार कौन?
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