पिता का साया उठा, फिर भी नहीं मानी हार: अस्मिता डे ने रचा इतिहास, भारत को दिलाया पहला जूडो गोल्ड
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कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत के लिए एक ऐतिहासिक पल आया। 23 वर्षीय जूडो खिलाड़ी अस्मिता डे ने महिलाओं के 48 किलोग्राम वर्ग में गोल्ड मेडल जीतकर तिरंगे का मान बढ़ाया। यह कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास में भारत का जूडो में पहला स्वर्ण पदक है।

संघर्ष और दृढ़ संकल्प की कहानी अस्मिता त्रिपुरा के एक छोटे से गांव से ताल्लुक रखती हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने बचपन से ही जूडो को अपना जुनून बनाया। अपनी कड़ी मेहनत से उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई और अंततः कॉमनवेल्थ गेम्स जैसा बड़ा मंच हासिल किया।

पिता के निधन ने तोड़ दिया था हौसला अस्मिता की जीत के पीछे एक गहरा दर्द भी छिपा है। करीब सात महीने पहले उनके पिता का निधन हो गया। इस व्यक्तिगत क्षति ने उन्हें मानसिक रूप से झकझोर दिया था। उन्हें लगा कि सब कुछ खत्म हो गया है, लेकिन परिवार, कोच और साथियों ने उन्हें हार नहीं मानने दी।

मैदान पर दिखाया जादुई खेल फाइनल मुकाबले में अस्मिता का सामना कनाडा की अनुभवी हेइडी क्वाच से था। मुकाबला कांटे की टक्कर का रहा और गोल्डन स्कोर तक खिंच गया। अंत में, अस्मिता ने बेहतरीन तकनीक का इस्तेमाल करते हुए जीत हासिल की और स्वर्ण पदक पर अपना कब्जा जमा लिया।

मंच पर छलके आंसू जीत के बाद स्वर्ण पदक हाथ में लिए अस्मिता काफी भावुक नजर आईं। उन्होंने अपना यह ऐतिहासिक मेडल अपने दिवंगत पिता को समर्पित किया। उनकी आंखों के आंसू बयां कर रहे थे कि आज का दिन उनके पिता के लिए कितना खास होता।

भारतीय जूडो के लिए स्वर्णिम युग अस्मिता की इस जीत के साथ ही पुरुष वर्ग में हर्ष सिंह ने भी स्वर्ण पदक अपने नाम किया। कॉमनवेल्थ गेम्स के एक ही संस्करण में दो गोल्ड मेडल जीतकर भारतीय जूडो ने एक नई इबारत लिख दी है। यह जीत आने वाले समय में देश के अन्य युवा खिलाड़ियों के लिए एक बड़ी प्रेरणा साबित होगी।

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