अंकित शर्मा हत्याकांड: ताहिर हुसैन को फांसी क्यों नहीं? अदालत ने उम्रकैद के पीछे गिनाईं ये ठोस वजहें
News Image

दिल्ली दंगों (2020) से जुड़े बहुचर्चित आईबी अधिकारी अंकित शर्मा हत्याकांड में कड़कड़डूमा कोर्ट ने आप के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन समेत पांच दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। पुलिस ने सभी के लिए फांसी की मांग की थी, लेकिन कोर्ट ने इसे रेयरेस्ट ऑफ रेयर नहीं माना। आखिर कानून की नजर में वे कौन से कारक रहे, जिन्होंने फांसी के फंदे और दोषियों के बीच दीवार खड़ी कर दी?

‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ की कानूनी कसौटी भारतीय कानून में फांसी की सजा अपवाद स्वरूप दी जाती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपराध की गंभीरता ही एकमात्र आधार नहीं हो सकती। मौत की सजा तभी मुमकिन है जब यह साबित हो जाए कि अपराधी के सुधरने की कोई संभावना नहीं बची है और उसका समाज में रहना स्थायी खतरा है। अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि दोषियों का स्वभाव जन्मजात हिंसक है।

सजा में नरमी क्यों? सुधरने की संभावना बनी आधार फैसला सुनाते समय कोर्ट ने दोषियों के जेल के आचरण को भी परखा। ताहिर हुसैन और अन्य दोषियों का जेल के अंदर का बर्ताव संतोषजनक पाया गया। वहीं, जमानत पर बाहर रहे जावेद अनस के खिलाफ किसी नए अपराध का रिकॉर्ड नहीं मिला। कोर्ट ने इसे मिटिगेटिंग फैक्टर (राहत देने वाली परिस्थितियां) माना। इसके अलावा, चार दोषियों की कमजोर शैक्षणिक पृष्ठभूमि को भी उनके भड़कावे में आने का एक कारण माना गया।

क्या घर लॉन्चपैड था? कोर्ट ने इस दलील को नकारा अभियोजन पक्ष की सबसे बड़ी दलील थी कि ताहिर हुसैन का घर दंगाइयों का लॉन्चपैड था। कोर्ट ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। जज ने कहा कि न तो यह आरोप शुरुआती चार्जशीट का हिस्सा था और न ही सुनवाई के दौरान इसे पर्याप्त साक्ष्यों से पुष्ट किया जा सका। अतः इसे सजा बढ़ाते समय आधार नहीं बनाया गया।

अंकित का परिवार और राजनीतिक टकराव अंकित शर्मा के परिवार ने फैसले का स्वागत किया, लेकिन वे अभी भी असंतुष्ट हैं। भाई अंकुर शर्मा ने दोहराया कि नृशंस हत्या के लिए फांसी ही एकमात्र उचित सजा होनी चाहिए थी। वहीं, फैसले के बाद दिल्ली की सियासत फिर गर्म है। आप ने ताहिर को निष्कासित करने की बात दोहराई, तो बीजेपी ने इसे राजनीतिक संरक्षण का मामला बताते हुए अरविंद केजरीवाल से माफी की मांग की।

अब आगे क्या? फिलहाल ताहिर हुसैन ने फैसले के बाद हाई कोर्ट में अपील करने की बात कही है। दूसरी ओर, अगर अभियोजन पक्ष को लगता है कि सजा कम है, तो वे भी उच्च न्यायालय में फांसी की मांग कर सकते हैं। फिलहाल कानूनी लड़ाई का एक दौर समाप्त हुआ है, लेकिन अंतिम न्याय की राह अभी खुली हुई है।

कुछ अन्य वेब स्टोरीज

Story 1

अबूझमाड़ में जल प्रलय: BSF कैंप में घुसा बाढ़ का पानी, जान बचाने के लिए छत और पेड़ों पर चढ़े जवान

Story 1

नीरज चोपड़ा बनाम अरशद नदीम: आज रात जेवलिन थ्रो के गोल्ड मेडल के लिए महामुकाबला

Story 1

PoK में खून-खराबा और पाकिस्तान का क्रूर चेहरा: 40 से ज्यादा मौतों पर भारत ने घेरा

Story 1

भैया, आप भाजपा के हो क्या? ... सवाल सुनते ही राहुल गांधी का बदला अंदाज

Story 1

अब राशन कार्ड की समस्याओं का होगा झटपट समाधान, WhatsApp पर ही दर्ज करें अपनी शिकायत

Story 1

गालियां देने वाले भी मेरे बच्चे : पीएम मोदी का बड़ा दिल, बोले- उन्हें माफ कर राह दिखाना मेरा काम

Story 1

राजस्थान कांग्रेस में डिजिटल वार : पोस्टरों से निकलकर सोशल मीडिया पर छिड़ी वर्चस्व की जंग

Story 1

पिता का सपना, बेटी की जीत: अस्मिता डे ने जूडो में रचा इतिहास, जीता पहला स्वर्ण पदक

Story 1

चूहों का महा-साहस : ज्वेलरी शॉप में की 10 लाख की चोरी, बिल खोदते ही उड़ गए दुकानदार के होश

Story 1

संसद में साधु बनकर बैठे पप्पू यादव, राम मंदिर चढ़ावा चोरी के आरोपों पर अनोखा प्रदर्शन