राजस्थान कांग्रेस में डिजिटल वार : पोस्टरों से निकलकर सोशल मीडिया पर छिड़ी वर्चस्व की जंग
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राजस्थान कांग्रेस में अंदरूनी कलह अब नई डिजिटल दिशा ले चुकी है। पार्टी में जारी खींचतान अब बंद कमरों से निकलकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर खुलकर सामने आ गई है, जहां अलग-अलग नेताओं के समर्थन में बाकायदा डिजिटल कैंपेन चलाए जा रहे हैं।

गहलोत फिर से अकाउंट बना विवाद की जड़ हाल ही में गहलोत फिर से नाम के एक एक्स (ट्विटर) अकाउंट ने सियासी हलचल तेज कर दी है। इस अकाउंट के जरिए पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के समर्थन में लगातार पोस्ट शेयर किए जा रहे हैं। इस डिजिटल सक्रियता ने पार्टी में एक बार फिर स्पष्ट गुटबाजी की चर्चाओं को हवा दे दी है।

डोटासरा का कड़ा प्रहार: ब्रांडिंग नहीं, संगठन जरूरी विवाद तब और गहरा गया जब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने बिना नाम लिए पार्टी नेताओं को नसीहत दी। महेंद्रजीत सिंह मालवीय द्वारा आयोजित एक जॉइनिंग कार्यक्रम के बाद डोटासरा ने तल्ख लहजे में कहा कि किसी एक व्यक्ति की ब्रांडिंग करने के बजाय संगठन को मजबूत करना प्राथमिकता होनी चाहिए।

डोटासरा ने स्पष्ट किया, कांग्रेस किसी एक व्यक्ति से बड़ी है। मैं न अपनी ब्रांडिंग करूंगा और न ही किसी और की। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अतीत में कांग्रेस को इन्हीं अंदरूनी मतभेदों के कारण सत्ता गंवानी पड़ी है।

सोशल मीडिया पर दो ध्रुव डोटासरा के बयान के बाद सोशल मीडिया दो खेमों में बंट गया है। एक तरफ गहलोत फिर से अकाउंट पर पूर्व मुख्यमंत्री के जोधपुर दौरे और उनके समर्थक आधार को प्रमुखता से दिखाया जा रहा है। दूसरी तरफ, डोटासरा के समर्थकों ने उनके वीडियो शेयर करते हुए उनकी साफगोई और संगठन सर्वोपरि के सिद्धांत की जमकर तारीफ की है।

मालवीय की वापसी पर भी चर्चा महेंद्रजीत सिंह मालवीय की कांग्रेस में वापसी और गहलोत के प्रति उनके झुकाव को लेकर भी डोटासरा ने बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि मालवीय से भाजपा में जाकर गलती हुई थी, जिसे उन्होंने मान लिया है। डोटासरा का कहना है कि जब तक कोई पार्टी के साथ है, वे उनके साथ हैं, लेकिन अनुशासन का पालन सबको करना होगा।

क्या चुनाव पर पड़ेगा असर? राजस्थान कांग्रेस में नेतृत्व को लेकर पुराने मतभेद किसी से छिपे नहीं हैं, लेकिन अब सोशल मीडिया नैरेटिव तैयार करने की होड़ ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि विधानसभा चुनावों से ठीक पहले यह गुटबाजी इसी तरह डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर हावी रही, तो यह पार्टी की चुनावी तैयारियों और एकजुटता के लिए बड़ा चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है।

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