देश के 1 लाख स्कूलों का सिंगल सहारा: शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल!
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नई शिक्षा नीति (NEP 2020) और शिक्षा का अधिकार (RTE) भले ही हर बच्चे को समान और बेहतर शिक्षा का वादा करते हों, लेकिन जमीनी हकीकत इन वादों पर सवाल खड़े कर रही है। संसद में पेश ताजा आंकड़ों के मुताबिक, देश में 1,00,843 स्कूल ऐसे हैं जो सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं।

एक शिक्षक, अनंत जिम्मेदारियां इन स्कूलों में नियुक्त इकलौता शिक्षक ही प्रधानाध्यापक है, वही क्लर्क है और वही चपरासी भी। उसे पहली से पांचवीं तक के बच्चों को एक साथ पढ़ाना पड़ता है, सरकारी योजनाओं का हिसाब रखना होता है, मिड-डे मील की निगरानी करनी होती है और प्रशासनिक कागजी कार्रवाई पूरी करनी होती है।

शिक्षा की गुणवत्ता पर बुरा असर जब एक शिक्षक को अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को एक ही कमरे में बिठाकर पढ़ाना पड़ता है, तो शिक्षा की गुणवत्ता का प्रभावित होना स्वाभाविक है। कई बार एक ही शिक्षक को सभी विषय—गणित से लेकर विज्ञान तक—पढ़ाने पड़ते हैं, जिससे विद्यार्थियों के सीखने की क्षमता और परिणाम दोनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

किन राज्यों में सबसे गंभीर स्थिति? शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी UDISE+ 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार, आंध्र प्रदेश सिंगल टीचर स्कूलों की सूची में सबसे ऊपर है। इसके बाद झारखंड, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्यों का बुरा हाल है। विशेषज्ञ मानते हैं कि आदिवासी और पहाड़ी क्षेत्रों में यह समस्या सबसे अधिक है, जहाँ शिक्षकों की तैनाती एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

क्यों बनी यह स्थिति? शिक्षा मंत्रालय के अनुसार, शिक्षकों का रिटायर होना, अचानक ट्रांसफर, इस्तीफे और समय पर रिक्त पदों को न भरना इस संकट के मुख्य कारण हैं। हालांकि, शिक्षकों की नियुक्ति राज्य सरकारों के अधीन है, लेकिन केंद्र सरकार समग्र शिक्षा योजना के तहत वित्तीय सहायता प्रदान करती है। बावजूद इसके, रिक्त पदों की लंबी सूची कम होने का नाम नहीं ले रही।

क्या NEP 2020 के लक्ष्य हासिल हो पाएंगे? नई शिक्षा नीति का जोर बुनियादी साक्षरता और बेहतर छात्र-शिक्षक अनुपात पर है। लेकिन जब एक ही शिक्षक पर पूरे संस्थान का बोझ हो, तो इन महत्त्वाकांक्षी लक्ष्यों को हासिल करना लगभग असंभव सा लगता है। विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि जब तक प्रत्येक स्कूल में शिक्षकों की पर्याप्त संख्या सुनिश्चित नहीं की जाएगी, तब तक भारत की शिक्षा प्रणाली में गुणात्मक सुधार एक सपना ही बना रहेगा।

समाधान की राह क्या है? शिक्षाविदों का सुझाव है कि अब समय आ गया है कि सरकार खाली पदों पर युद्धस्तर पर भर्ती करे। साथ ही, ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में शिक्षकों को काम करने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु विशेष नीतियां बनानी होंगी। पारदर्शी ट्रांसफर पॉलिसी और स्कूलों में जरूरी संसाधनों की उपलब्धता ही आने वाली पीढ़ी का भविष्य सुरक्षित कर सकती है।

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