भारतीय हॉकी की नई भगवा जर्सी पर घमासान: क्या परंपरा से अलग होना सही है?
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अगले महीने बेल्जियम और नीदरलैंड्स में होने वाले हॉकी वर्ल्ड कप से पहले भारतीय हॉकी टीम की जर्सी चर्चा का विषय बन गई है। हॉकी इंडिया ने दशकों से चली आ रही पारंपरिक नीली जर्सी को बदलकर इस बार भगवा (केसरिया) रंग की किट पेश की है, जिसके बाद खेल जगत में तीखी प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया है।

विवाद की शुरुआत: परंपरा बनाम बदलाव

विवाद की शुरुआत 27 जुलाई को हुई, जब हॉकी इंडिया ने पुरुष और महिला टीमों के लिए वर्ल्ड कप 2026 की नई जर्सी लॉन्च की। इस किट में नीला रंग गायब है और उसकी जगह भगवा रंग ने ले ली है। लॉन्च के दौरान गायक सुखविंदर सिंह के देशभक्ति गीतों का इस्तेमाल किया गया, लेकिन सोशल मीडिया पर प्रशंसकों और विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है।

पूर्व कप्तान विरेन रासकिन्हा का कड़ा विरोध

भारतीय टीम के पूर्व कप्तान और 2001 जूनियर वर्ल्ड कप विजेता टीम के सदस्य विरेन रासकिन्हा ने इस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने सोशल मीडिया पर इसे शर्मनाक करार देते हुए कहा कि भारतीय हॉकी की पहचान दशकों से नीला रंग रही है। उन्होंने तर्क दिया कि रंग बदलने का कोई ठोस या तार्किक कारण नजर नहीं आता।

हॉकी इंडिया का तर्क: साहस और नई शुरुआत

विवाद बढ़ता देख हॉकी इंडिया ने अपना बचाव किया है। महासंघ के अनुसार, भगवा रंग साहस, बलिदान और जीत का प्रतीक है। उनका मानना है कि यह रंग तिरंगे के उगते सूर्य से प्रेरित है, जो एक नई शुरुआत का संदेश देता है।

नई जर्सी में मंडाला डिजाइन, अशोक चक्र से प्रेरित नेवी ब्लू टच और कंधों पर तिरंगे की पट्टी भी जोड़ी गई है। साथ ही, इंडिया शब्द को देवनागरी लिपि में लिखा गया है, जिसे संगठन ने एक सोची-समझी डिजाइन रणनीति बताया है।

क्या जर्सी के रंग को लेकर कोई अंतरराष्ट्रीय नियम है?

हॉकी में जर्सी के रंग के संबंध में इंटरनेशनल हॉकी फेडरेशन (FIH) के नियम काफी लचीले हैं। FIH किसी देश की जर्सी का रंग तय नहीं करता, टीमें स्वतंत्र रूप से अपना रंग चुन सकती हैं। मुख्य शर्त केवल यह है कि मैच के दौरान आमने-सामने खड़ी दो टीमों की जर्सी का रंग आपस में मिलना नहीं चाहिए।

संस्थाएं अपनी मर्जी की मालिक

खेल विशेषज्ञों का मानना है कि जर्सी के रंग का चुनाव पूरी तरह से संबंधित खेल संघ (जैसे बीसीसीआई या हॉकी इंडिया) के अधिकार क्षेत्र में आता है। क्रिकेट और हॉकी की नियामक संस्थाएं अलग हैं, इसलिए वे अपनी-अपनी ब्रांडिंग और पसंद के अनुसार निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं।

फिलहाल, खिलाड़ी मैदान पर उतरने के लिए तैयार हैं, लेकिन भारतीय हॉकी के गलियारों में नीली जर्सी की वापसी की मांग लगातार जोर पकड़ रही है।

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