कब खुलेगी सिस्टम की नींद? मासूम बच्ची से लेकर बुजुर्ग तक, लापरवाही की भेंट चढ़ रही जिंदगी
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बुलंदशहर/हैदराबाद: मानसून का मौसम इन दिनों देश के कई हिस्सों में मौत का साया बनकर मंडरा रहा है। यह मौत प्राकृतिक नहीं, बल्कि सरकारी सिस्टम की खुली लापरवाही का नतीजा है। खुले नाले और बिना सुरक्षा घेरे के गड्ढे अब लोगों की जान ले रहे हैं, जबकि जिम्मेदार अधिकारी हादसे के बाद केवल बचाव का नाटक करते नजर आते हैं।

बुलंदशहर: 30 घंटे बाद भी बच्ची लापता यूपी के बुलंदशहर में एक 11 साल की बच्ची स्कूल से घर लौटते समय खुले नाले में बह गई। भारी बारिश के चलते नाला उफान पर था और बच्ची को रास्ता नहीं दिखा। घटना को 30 घंटे से ज्यादा का समय बीत चुका है, लेकिन प्रशासन, पुलिस और NDRF की तमाम कोशिशों के बावजूद बच्ची का कोई सुराग नहीं मिला है। हादसा होने के बाद अब पूरे शहर के ड्रेनेज सिस्टम की सफाई और तलाशी का दिखावा किया जा रहा है।

हैदराबाद: बुजुर्ग भी बने सिस्टम की बलि यह लाचारी सिर्फ छोटे शहरों तक सीमित नहीं है। हाई-टेक शहर हैदराबाद में 70 वर्षीय बलैया अपनी बेटी के घर जा रहे थे। सीवर कार्य के लिए खोदा गया एक गहरा गड्ढा पानी भरा होने के कारण उन्हें दिखाई नहीं दिया। वह उसमें गिर गए और तेज बहाव के साथ बह गए। बुजुर्ग की तलाश अब कई किलोमीटर दूर तक की जा रही है, लेकिन वे अभी तक नहीं मिले हैं।

क्या जान गंवाना ही सिस्टम को जगाने का एकमात्र रास्ता है? सवाल यह उठता है कि नगर पालिका का बजट कहां खर्च हो रहा है? जब मानसून आने की जानकारी पहले से होती है, तो नालों को खुला क्यों छोड़ा गया? क्या अधिकारियों की सैलरी आम जनता की सुरक्षा के लिए नहीं है? आज हर अधिकारी सड़कों पर तलाशी का नाटक कर रहा है, लेकिन यह सवाल जस का तस है कि क्या किसी की जान जाने के बाद ही सिस्टम को सुध लेनी चाहिए?

आंकड़ों में मौत का खेल यह केवल दो घटनाएं नहीं हैं, बल्कि यह देश भर में फैले अंधे और बहरे सिस्टम का सबूत है। इस मानसून में लापरवाही के कारण हुई मौतों का सिलसिला डरावना है:

एक बच्ची स्कूल से लौटते हुए अपना भविष्य खो देती है, तो एक बुजुर्ग जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर सिस्टम के गड्ढे में समा जाता है। क्या हमारा सिस्टम इतना भी संवेदनशील नहीं बचा कि वह अपनी बुनियादी जिम्मेदारियों को पूरा कर सके? यह प्रश्न आज हर उस व्यक्ति का है जो सड़कों पर चलने से डर रहा है।

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