पिता के संघर्ष का साक्षी को मिला पदक इनाम, ग्लासगो रिंग में हरियाणा की बेटी का दम
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ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में हरियाणा की बॉक्सर साक्षी चौधरी ने इतिहास रच दिया है। 51 किलोग्राम भार वर्ग के क्वार्टरफाइनल मुकाबले में आयरलैंड की कैटलिन फ्रेयर्स को 5-0 से करारी शिकस्त देकर साक्षी ने भारत के लिए कांस्य पदक पक्का कर लिया है। जिस आक्रामक अंदाज में उन्होंने जीत दर्ज की है, उसे देखकर उम्मीदें बढ़ गई हैं कि वह स्वर्ण या रजत पदक के साथ घर लौटेंगी।

साधारण किसान परिवार से सुनहरे सफर तक साक्षी का जन्म रोहतक जिले के धनखड़ी गांव के एक बेहद साधारण किसान परिवार में हुआ। उनके परिवार में खेलों का कोई बैकग्राउंड नहीं था, लेकिन साक्षी बचपन से ही जिद्दी और ऊर्जावान थीं। शुरुआत में उनका मन क्रिकेट में रमता था, लेकिन सही दिशा न मिलने के डर से परिवार ने उन्हें बॉक्सिंग अकादमी में डाल दिया। यह फैसला आज भारत के लिए एक पदक लेकर आया है।

पिता की टूटी मोटरसाइकिल और अटूट विश्वास इस पदक के पीछे साक्षी की मेहनत के साथ-साथ उनके पिता का बड़ा बलिदान है। जब साक्षी जूनियर स्तर पर ट्रेनिंग ले रही थीं, तो उन्हें रोहतक शहर में कमरा लेकर रहना पड़ा। साक्षी के पिता अपनी टूटी हुई मोटरसाइकिल से गांव से रोजाना शहर आते थे। वे बेटी के लिए घर का खाना और दूध लाते थे ताकि डाइट में कोई कमी न रहे। पिता ने घर की जरूरतों को ताक पर रखकर अपनी पूरी कमाई बेटी के खेल उपकरणों और ट्रेनिंग पर लगा दी।

चोटों ने दी चुनौती, पर नहीं मानी हार साक्षी का करियर उतार-चढ़ाव भरा रहा है। शुरुआत में कंधे और कलाई की गंभीर चोटों ने उनके सफर को कई बार रोकने की कोशिश की। महीनों तक रिंग से दूर रहने के कारण कई बार लगा कि करियर खत्म हो चुका है, लेकिन उन्होंने हर बार वापसी की।

करियर का टर्निंग पॉइंट बनी निकहत जरीन पर जीत ग्लासगो जाने का सफर साक्षी के लिए आसान नहीं था। उनके करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट नेशनल ट्रायल्स साबित हुए। उन्होंने सेमीफाइनल में दो बार की वर्ल्ड चैंपियन निकहत जरीन और फाइनल में मौजूदा वर्ल्ड चैंपियन मीनाक्षी हुड्डा को हराकर सबको चौंका दिया। इसी जीत ने उनके लिए अंतरराष्ट्रीय मंच के द्वार खोले और आज वह देश का नाम रोशन कर रही हैं।

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