संसद में गूंजा Gen-Z का शोर: Delulu से लेकर वास्तेगुने हुईंया तक, नेताओं ने बदली बहस की भाषा
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संसद में इन दिनों मानसून सत्र के दौरान एक दिलचस्प नज़ारा देखने को मिल रहा है। सदन के भीतर गंभीर चर्चाओं के बीच अब जेन-जी (Gen-Z) के ट्रेंडिंग स्लैंग्स की एंट्री हो चुकी है। सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों ही युवा मतदाताओं को लुभाने या एक-दूसरे पर तंज कसने के लिए सोशल मीडिया की भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं।

क्या है मामला? हाल ही में नीट (NEET) पेपर लीक के खिलाफ जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने सोशल मीडिया पर लोकप्रिय शब्दों का खुलकर इस्तेमाल किया था। अब यही इंटरनेट की भाषा संसद की कार्यवाही का हिस्सा बन गई है। मंगलवार को एंटी-पेपर लीक बिल पर चर्चा के दौरान सांसदों ने जमकर इन शब्दों का प्रयोग किया।

बीजेपी सांसदों का मॉडर्न वार भाजपा सांसद बांसुरी स्वराज ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने स्थिति को समझते हुए सही समाधान निकाला, या Gen-Z की भाषा में कहें तो उन्होंने Clocked it किया। इसका अर्थ है किसी छिपे हुए सच को भांप लेना या सटीक पहचान करना।

वहीं, तेजस्वी सूर्या ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि अगर उन्हें लगता है कि युवा उनके साथ हैं, तो यह उनका Delulu है। Delulu यानी भ्रम में रहना या वास्तविकता से परे जाकर अजीब उम्मीदें पालना।

शिवसेना (शिंदे गुट) का तंज शिवसेना सांसद श्रीकांत शिंदे ने विपक्ष की रणनीति को स्लैंग्स के जरिए समझाया। उन्होंने कहा कि विपक्षी दल पहले 37 दिनों तक गायब रहे यानी MIA (Missing In Action) थे। फिर उन्हें सत्ता जाने का डर सताया जिसे FOMO (Fear Of Missing Out) कहते हैं, और अंततः वे Delulu का शिकार हो गए।

कांग्रेस का पलटवार: वास्तेगुने हुईंया और कुचु-पुचु कांग्रेस सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि छात्र प्यार से इस्तीफा मांग रहे थे। उन्होंने संसद में वास्तेगुने हुईंया (इंटरनेट पर बना एक निरर्थक मीम शब्द) और कुचु-पुचु (प्यार जताने वाला शब्द) का जिक्र कर सरकार के लहजे पर कटाक्ष किया।

सुप्रिया सुले ने खींची लक्ष्मण रेखा हालांकि, इस भाषाई प्रयोग पर सभी सहमत नहीं थे। एनसीपी (शरद पवार गुट) की सांसद सुप्रिया सुले ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा, हम यहां ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी की प्रतियोगिता के लिए नहीं आए हैं। यह युवाओं के भविष्य का गंभीर मुद्दा है, इसे स्लैंग्स तक सीमित न रखा जाए।

संसद में हो रही यह बहस दर्शाती है कि राजनीति अब सोशल मीडिया की धुन पर चलने के लिए मजबूर है, भले ही इसके लिए शब्दों की गंभीरता का बलिदान ही क्यों न देना पड़े।

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