26 दिनों की लंबी भूख हड़ताल के बाद राजघाट पहुंचे सोनम वांगचुक, गांधीवादी मूल्यों का दोहराया संकल्प
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नई दिल्ली: जलवायु कार्यकर्ता और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक ने अपनी 26 दिनों की लंबी भूख हड़ताल के बाद पहली बार सार्वजनिक रूप से कदम रखा है। अस्पताल से छुट्टी मिलते ही वांगचुक सीधे राजघाट पहुंचे, जहां उन्होंने महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित की।

गांधी के सिद्धांतों पर अटूट विश्वास

राजघाट पर मीडिया से बात करते हुए वांगचुक ने कहा कि उनका वहां आना केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि उनके संघर्ष और विचारधारा का केंद्र बिंदु है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सत्याग्रह, अहिंसा और शांतिपूर्ण आंदोलन ही उनके संघर्ष का आधार हैं। गांधीवादी सिद्धांतों को अपनाकर ही देश में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है।

अस्पताल से सीधे समाधि तक

वांगचुक अपनी पत्नी गीतांजलि आंग्मो के साथ राजघाट पहुंचे। अपनी मांगों को लेकर लगातार 26 दिनों तक उपवास रखने के बाद उनकी तबीयत काफी बिगड़ गई थी, जिसके चलते उन्हें गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया था। स्वास्थ्य में सुधार होते ही उन्होंने अपनी पहली सार्वजनिक यात्रा के रूप में गांधी समाधि को चुना।

संवैधानिक समाधान और धैर्य की अपील

अपनी मांगों पर जोर देते हुए वांगचुक ने कहा कि वे पूरी तरह से संवैधानिक और लोकतांत्रिक रास्तों के समर्थक हैं। उन्होंने दोहराया कि संवाद ही समस्याओं के समाधान का एकमात्र प्रभावी माध्यम है। उन्होंने उम्मीद जताई कि संबंधित पक्ष उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार करेंगे और कोई ठोस रास्ता निकलेगा।

लद्दाख और पर्यावरण का संघर्ष

सोनम वांगचुक लंबे समय से लद्दाख के पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदायों के अधिकारों के लिए आवाज उठा रहे हैं। उनके आंदोलन को पूरे देश से व्यापक समर्थन मिला है। समर्थकों का मानना है कि उनकी यह यात्रा गांधीवादी मूल्यों के प्रति उनके समर्पण को दर्शाती है।

आगे की रणनीति पर सबकी नजरें

अस्पताल से बाहर आने के बाद वांगचुक अब सक्रिय राजनीति और सामाजिक आंदोलनों में अपनी भूमिका जारी रखने के लिए तैयार हैं। हालांकि, उन्होंने अभी तक अपने अगले कदमों का खुलासा नहीं किया है, लेकिन यह स्पष्ट है कि उनका शांतिपूर्ण संघर्ष आगे भी जारी रहेगा। उनके अगले कदम को लेकर सामाजिक और राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है।

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