दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल ही में समाप्त हुआ छात्र आंदोलन सत्ता के गलियारों में हलचल पैदा कर गया है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा कथित तौर पर किए गए बल प्रयोग, विशेषकर पैलेट गन और AK-47 के इस्तेमाल ने कानून प्रवर्तन एजेंसियों को कटघरे में खड़ा कर दिया है। अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है।
आंदोलन के दौरान दो प्रमुख घटनाएं सुर्खियां बटोर रही हैं। पहली, दिल्ली के जंतर-मंतर पर आरएएफ (RAF) द्वारा छात्रों पर पैलेट गन चलाने का आरोप। दूसरी, बिहार के सिवान में एक पुलिसकर्मी द्वारा प्रदर्शनकारियों के सामने AK-47 लहराने और फायरिंग करने का वीडियो। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इसे छात्रों के भविष्य पर हमला करार देते हुए सरकार को घेरा है।
राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दायर कर पुलिस की कार्रवाई की न्यायिक जांच की मांग की है। याचिका में सिवान में AK-47 के प्रयोग और जंतर-मंतर पर अत्यधिक बल प्रयोग को लेकर FIR दर्ज करने की मांग की गई है। अदालती दखल के बाद अब पुलिस के लिए अपने बचाव में ठोस तर्क देना मुश्किल हो गया है।
विवाद बढ़ने के बाद सरकार बैकफुट पर है। सिवान मामले में आरोपी पुलिसकर्मी को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है और उच्च स्तरीय जांच के आदेश दे दिए गए हैं। जंतर-मंतर पर पैलेट गन के इस्तेमाल की जांच सीआरपीएफ (CRPF) के स्तर पर की जा रही है, हालांकि अभी तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।
पैलेट गन एक शॉटगन है जो एक साथ सैकड़ों छोटे धातु के छर्रे बिखेरती है। इसे कम-घातक हथियार माना जाता है, लेकिन इसकी मारक क्षमता चेहरे और आंखों के लिए बेहद खतरनाक है। कई मामलों में इसके प्रयोग से प्रदर्शनकारियों को स्थायी दृष्टिहानि (अंधापन) का सामना करना पड़ा है। आलोचकों का तर्क है कि छात्रों जैसे निहत्थे समूह पर ऐसे हथियारों का इस्तेमाल करना मानवाधिकारों का उल्लंघन है।
भारतीय कानून के अनुसार, प्रदर्शनों के दौरान हथियारों का प्रयोग केवल अंतिम विकल्प (Last Resort) होना चाहिए। पहले लाठीचार्ज, आंसू गैस या पानी की बौछार जैसे उपायों को प्राथमिकता दी जाती है। गोलीबारी या घातक हथियारों का इस्तेमाल तभी जायज है जब प्रदर्शनकारियों से जान का गंभीर खतरा हो। पुलिस का उद्देश्य भीड़ को तितर-बितर करना होना चाहिए, न कि दंड देना।
विशेषज्ञों के बीच इसे लेकर मतभेद हैं। जहां कुछ लोग इसे कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी मानते हैं, वहीं मानवाधिकार कार्यकर्ता इसे लोकतंत्र में असहमति की आवाज को दबाने का जरिया बता रहे हैं। सवाल यह है कि क्या एक छात्र प्रदर्शन में, जहां कोई हिंसक पत्थरबाजी या जातीय दंगा नहीं था, वहां पैलेट गन का उपयोग करना पुलिस की अदूरदर्शिता को नहीं दर्शाता? फिलहाल, जांच की रिपोर्ट और अदालत का रुख ही तय करेगा कि पुलिस विभाग की इस कार्यशैली पर क्या कार्रवाई होती है।
*🚨Policeman who fired AK-47 during student s protest in Bihar s Siwan has been suspended pic.twitter.com/EufVYO6s8j
— The Tatva (@thetatvaindia) July 27, 2026
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