मोदी कैबिनेट पर दूसरा खतरा: E20 जनता पार्टी का उदय, नितिन गडकरी के इस्तीफे की मांग!
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NEET पेपर लीक मामले में केंद्र सरकार को बैकफुट पर धकेलने के बाद, अब मोदी कैबिनेट के सामने एक नया और बड़ा संकट खड़ा हो गया है। इस बार निशाने पर है केंद्र सरकार की इथेनॉल ब्लेंडिंग नीति और सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी। सोशल मीडिया पर उभरी E20 जनता पार्टी ने नीति के विरोध में मोर्चा खोल दिया है।

क्या है E20 जनता पार्टी और क्यों मचा है बवाल?

CJP (कॉकरोच जनता पार्टी) के सफल डिजिटल अभियान से प्रेरित होकर, E20 जनता पार्टी ने शनिवार-रविवार को अपनी मुहिम शुरू की। यह कोई पारंपरिक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि एक डिजिटल प्रेशर ग्रुप है। मात्र कुछ घंटों में इसने सोशल मीडिया पर तूफान खड़ा कर दिया है।

इनकी मांगें स्पष्ट हैं:

ट्रांसपोर्टरों का साथ, 4 अगस्त को संसद मार्च

इस डिजिटल आंदोलन को अब जमीनी समर्थन भी मिल गया है। दिल्ली टैक्सी और पर्यटक परिवहनकर्ता एवं टूर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ने इस मुहिम को अपना समर्थन देने का ऐलान किया है।

ट्रांसपोर्टरों का तर्क है कि E20 ईंधन के कारण उनके वाहनों का माइलेज घट गया है और रखरखाव का खर्च बढ़ गया है। उनका कहना है कि पुराने इंजनों पर इसका असर बेहद नकारात्मक है। अपनी इन समस्याओं को सरकार तक पहुँचाने के लिए 4 अगस्त को संसद मार्च की तैयारी की जा रही है।

सरकार का तर्क बनाम जनहित का सवाल

सरकार का पक्ष हमेशा से साफ रहा है। नितिन गडकरी और सरकार का दावा है कि E20 नीति से देश को विदेशी मुद्रा की बचत होगी, आयात कम होगा और किसानों की आय बढ़ेगी। सरकार इसे ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण के लिए एक क्रांतिकारी कदम मानती है।

हालांकि, जनता का एक बड़ा वर्ग अब विकल्प की आजादी की मांग कर रहा है। उनका कहना है कि वे न तो सब्सिडी मांग रहे हैं और न ही नीति को पूरी तरह खत्म करने की जिद कर रहे हैं, बस उन्हें शुद्ध ईंधन चुनने का अधिकार चाहिए।

क्या यह मोदी सरकार के लिए दूसरी बड़ी चुनौती है?

NEET मामले में शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग के बाद, अब नितिन गडकरी के मंत्रालय का घेराव सरकार के लिए दोहरी मुसीबत लेकर आया है। कुर्सी खाली करो जनता आती है के नारों के साथ सोशल मीडिया पर सक्रिय यह समूह अब एक बड़ी राजनीतिक हलचल पैदा करने की तैयारी में है।

आगामी 4 अगस्त को होने वाला प्रदर्शन यह तय करेगा कि क्या सरकार इस नई आवाज को अनसुना कर पाती है, या फिर इसे भी झुककर कोई बड़ा नीतिगत बदलाव करना पड़ेगा।

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