जंतर-मंतर का आंदोलन: क्या भटक गया है ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का रास्ता?
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क्या कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का शिक्षा सुधार और पेपर लीक के खिलाफ शुरू हुआ आंदोलन अब अपने मूल रास्ते से भटक गया है? हाल ही में जंतर-मंतर से सामने आई तस्वीरें और वीडियो इस सवाल को और गहरा कर रहे हैं कि क्या यह आंदोलन अब हाईजैक हो चुका है।

धार्मिक नारों का अखाड़ा बना प्रदर्शन स्थल

बुधवार रात जंतर-मंतर से हैरान करने वाले वीडियो सामने आए। एक ओर जहाँ लाउडस्पीकर पर धार्मिक टिप्पणियाँ की गईं, वहीं दूसरी ओर भीड़ से नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु अकबर और जय श्रीराम के नारे एक साथ गूंजने लगे। शांतिपूर्ण विरोध के बजाय धार्मिक नारेबाजी ने आंदोलन के मूल उद्देश्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

तलवार और भालों के साथ निहंग सिखों की एंट्री

प्रदर्शन स्थल के पास टॉल्सटॉय मार्ग पर निहंग सिखों का एक समूह तलवार और भालों के साथ नजर आया। कुछ प्रदर्शनकारियों का पुलिस को सीधी चुनौती देना और बहन-बेटियों की बात आने पर किसी को नहीं छोड़ेंगे जैसे भड़काऊ बयान देना यह दिखाता है कि माहौल अब छात्रों के मुद्दों से हटकर उग्र रूप ले चुका है।

संसद चलो मार्च के बाद बिगड़े हालात

20 जुलाई को हुए चलो संसद मार्च के बाद आंदोलन की तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। झड़प, लाठीचार्ज और आंसू गैस के इस्तेमाल के बाद यहां भीड़ तो बढ़ गई, लेकिन इसका नियंत्रण पूरी तरह से हाथ से निकल गया। अब यहां छात्रों के अलावा कई ऐसे समूह भी सक्रिय हैं, जिनका मूल आंदोलन के उद्देश्यों से दूर-दूर तक नाता नहीं दिखता।

सोनम वांगचुक के हटने के बाद आया खालीपन

पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की मौजूदगी तक आंदोलन अनुशासित और एजेंडा-आधारित था। उनके अस्पताल जाने के बाद, मंच पर नेतृत्व का एक खालीपन पैदा हुआ है। अब मंच पर शिक्षा सुधार के बजाय क्षेत्रीय राजनीति और धार्मिक मुद्दों पर बहस हावी नजर आती है।

क्या अपनी पहचान खो देगा आंदोलन?

बुधवार रात कनॉट प्लेस में हुई झड़प और सरकारी वाहनों में तोड़फोड़ ने इस खतरे को साफ कर दिया है कि नेतृत्वहीन भीड़ आसानी से हिंसक तत्वों का मोहरा बन सकती है। रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल सतीश दुआ जैसे विशेषज्ञों ने भी चिंता जताई है कि बिना संवाद और ठोस नेतृत्व के, एक मुद्दा-आधारित आंदोलन बाहरी एजेंडों की भेंट चढ़ सकता है।

फिलहाल, बड़ी संख्या में छात्र अब भी अपनी मांगों के साथ डटे हुए हैं, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या CJP इस शोर-शराबे और अलग-अलग एजेंडों के बीच अपनी मूल पहचान बचा पाएगी या यह आंदोलन किसी अनचाहे मोड़ पर खत्म हो जाएगा?

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