दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए हालिया प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया है। 20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी के संसद चलो मार्च के दौरान हुई लाठीचार्ज की घटनाओं पर अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने के निर्देश दिए हैं। अगली सुनवाई 11 सितंबर को होगी। इस घटना ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—आखिर भारत में लाठीचार्ज को लेकर कानून क्या कहता है?
हैरानी की बात यह है कि भारतीय कानून में कहीं भी लाठीचार्ज शब्द का जिक्र नहीं है। कानून पुलिस को आधिकारिक तौर पर लाठी बरसाने की अनुमति नहीं देता। इसके बजाय, कानून केवल न्यूनतम और उचित बल (Minimum and Reasonable Force) के प्रयोग की बात करता है। यानी पुलिस बल प्रयोग कर सकती है, लेकिन वह लाठीचार्ज नहीं, बल्कि व्यवस्था बनाए रखने के लिए एक सीमित प्रक्रिया है।
पुलिस हर प्रदर्शन पर लाठी का इस्तेमाल नहीं कर सकती। इसके लिए कुछ कानूनी शर्तें अनिवार्य हैं:
बिना चेतावनी या बिना कानूनी प्रक्रिया के सीधे बल प्रयोग करना कानूनन गलत है।
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट ने कई फैसलों में स्पष्ट किया है कि बल प्रयोग केवल न्यूनतम होना चाहिए। अदालतों का साफ मानना है कि पुलिस का उद्देश्य शांति बहाल करना है, न कि प्रदर्शनकारियों को सजा देना या उन्हें डराना। यदि पुलिस बल का उद्देश्य दंडात्मक हो, तो वह संविधान के अनुच्छेद 19 (शांतिपूर्ण जमा होने की आजादी) का सीधा उल्लंघन है।
अनिता ठाकुर बनाम जम्मू-कश्मीर सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक टिप्पणी की थी। कोर्ट ने कहा कि यदि प्रदर्शनकारी हिंसक भी हो जाएं, तब भी पुलिस जरूरत से ज्यादा बल नहीं बरत सकती। एक बार स्थिति नियंत्रण में आते ही तुरंत बल प्रयोग रोक देना चाहिए। जरूरत से ज्यादा ताकत का इस्तेमाल मानवाधिकारों और मानव गरिमा का उल्लंघन माना जाता है।
हालांकि केंद्रीय कानून में लाठीचार्ज शब्द नहीं है, लेकिन कुछ राज्यों के पुलिस मैनुअल में इसके निर्देश हैं। उदाहरण के तौर पर, केरल पुलिस मैनुअल कहता है कि लाठी का प्रहार शरीर के कोमल हिस्सों पर होना चाहिए, न कि सिर या गर्दन जैसे संवेदनशील अंगों पर।
वहीं, संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों (1990) के अनुसार, यदि प्रदर्शन शांतिपूर्ण है तो पुलिस को बल प्रयोग से पूरी तरह बचना चाहिए। अगर बल प्रयोग अति आवश्यक हो, तो उसका स्तर न्यूनतम होना चाहिए।
निष्कर्ष यह है कि भारत में पुलिस के पास भीड़ नियंत्रित करने की शक्ति तो है, लेकिन यह शक्ति अनियंत्रित नहीं है। कानून और न्यायपालिका स्पष्ट हैं: प्रदर्शनकारियों की आवाज दबाने के लिए बल का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
*Delhi: Supreme Court lawyer Nanita Sharma says, We have all gathered here to show solidarity with the students. We stand with them against the excesses they have been subjected to. The children were merely raising their voices against injustice and the education system... Those… pic.twitter.com/ENm03XSTEU
— IANS (@ians_india) July 23, 2026
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