पहले धंधे का हिसाब करो, फिर बाकी बातें: जयशंकर की खरी-खरी से चीन में खलबली
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फिलीपींस के मनीला में चल रहे ईस्ट एशिया समिट के दौरान विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच हुई मुलाकात चर्चा का विषय बन गई है। जयशंकर ने चीन के सामने व्यापार असंतुलन का मुद्दा उठाते हुए उसे साफ शब्दों में आईना दिखाया है।

बाजार में बराबरी का हक चाहिए जयशंकर ने स्पष्ट किया कि भारत और चीन के रिश्ते तब तक सामान्य नहीं हो सकते जब तक आर्थिक पेंच सुलझ नहीं जाते। भारत की सबसे बड़ी चिंता फेयर मार्केट एक्सेस की है। जयशंकर ने वांग यी से दो-टूक कहा कि चीन हमारे लिए अपने बाजार के दरवाजे पूरी तरह खोले। भारत चाहता है कि उसके सामान को भी चीनी बाजार में बिकने का उचित अवसर मिले।

112 अरब डॉलर का घाटा: चीन की दगाबाजी का सबूत आंकड़े बताते हैं कि चीन व्यापार के मामले में भारत के साथ बदमाशी कर रहा है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने चीन से 131.63 अरब डॉलर का माल खरीदा, जबकि हमने वहां सिर्फ 19.47 अरब डॉलर का निर्यात किया। यानी दोनों के बीच व्यापार घाटा 112.16 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। चीन खुद तो अपना सामान भारतीय बाजार में डंप कर रहा है, लेकिन जब भारतीय उत्पादों की बात आती है, तो उनके दरवाजे बंद हो जाते हैं।

दवा और तकनीक में क्यों है अड़ंगा? दुनियाभर में अपनी धाक जमाने वाले भारत के फार्मास्युटिकल (दवा) और आईटी सेक्टर को चीन जानबूझकर निशाना बना रहा है। भारत के राजदूत विक्रम दोरईस्वामी ने भी सवाल उठाया है कि जो भारतीय कंपनियां विकसित देशों को दवाएं बेच सकती हैं, उन्हें चीनी ग्राहकों से क्यों दूर रखा जा रहा है? चीन की यह नीति भारत के निर्यात को रोकने की एक सोची-समझी कोशिश लगती है।

कच्चा माल बेचकर महंगा इलेक्ट्रॉनिक्स खरीदना हमारी मजबूरी भारत जो माल चीन भेजता है, उसमें ज्यादातर लौह अयस्क और अन्य कच्चा माल होता है। बदले में, हम चीन से हाई-टेक मशीनरी, कंप्यूटर, टेलीकॉम पुर्जे और लिथियम-आयन बैटरी आयात करते हैं। यही अंतर हमारे व्यापार घाटे को लगातार बढ़ा रहा है। भारत कच्चे माल के बदले महंगे तैयार इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद खरीदने के जाल में फंस गया है।

सीमा पर शांति पहली और आखिरी शर्त व्यापार के अलावा, जयशंकर ने सीमा विवाद पर अपना रुख सख्त रखा है। उन्होंने वांग यी को साफ संदेश दिया कि वीजा नियमों में ढील या विमान सेवा शुरू होना सकारात्मक है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि भारत सीमा पर तनाव को भूल गया है। जयशंकर का स्पष्ट अल्टीमेटम है: सीमा पर शांति ही दोनों देशों के बीच संबंधों की पहली और अनिवार्य शर्त है। भारत अपनी सुरक्षा और संप्रभुता के मुद्दे पर किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगा।

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