दिल्ली के जंतर-मंतर पर शिक्षा व्यवस्था में सुधार और नीट (NEET) परीक्षाओं में धांधली के खिलाफ अनशन पर बैठे सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक अब सफदरजंग अस्पताल में भर्ती हैं। दिल्ली हाई कोर्ट के निर्देश पर पुलिस उन्हें वहां ले गई थी, लेकिन वांगचुक ने वहां भी अपना अनशन जारी रखने का संकल्प लिया है।
हालांकि, सोमवार को सोशल मीडिया पर वांगचुक द्वारा जारी तीन शर्तों ने एक नई बहस छेड़ दी है। इन शर्तों के सामने आते ही कई पत्रकार, एक्टिविस्ट और उनके समर्थक उनके इरादों पर सवाल उठा रहे हैं।
सोनम वांगचुक ने कहा है कि यदि सरकार शिक्षा व्यवस्था की नाकामियों की जिम्मेदारी लेती है, या राजनीतिक दल संसद में इस मुद्दे को उठाने का ठोस आश्वासन देते हैं, अथवा सांसद अस्पताल आकर उनसे मुलाकात करते हैं, तो वे अपना अनशन खत्म कर देंगे।
ध्यान देने वाली बात यह है कि इन शर्तों में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग का कोई जिक्र नहीं है, जो अब तक इस आंदोलन का मुख्य केंद्र बिंदु रही थी। इसी बदलाव ने लोगों को चौंका दिया है।
प्रोफेसर मुकेश कुमार और वरिष्ठ पत्रकार अपूर्वानंद जैसे बुद्धिजीवियों ने इसे निराशाजनक बताया है। आलोचकों का मानना है कि जिम्मेदारी सरकार से हटाकर विपक्ष पर डालना आंदोलन को कमजोर करने जैसा है। सोशल मीडिया पर सवाल उठ रहे हैं कि क्या वांगचुक ने खुद को कॉकरोच पार्टी के आंदोलन से अलग कर लिया है?
इतना ही नहीं, कुछ पत्रकारों ने तो यह तक आरोप लगाया है कि वांगचुक सरकार के साथ किसी तरह का समझौता कर रहे हैं या किसी दबाव में आकर आंदोलन को समाप्त करने का सम्मानजनक रास्ता ढूंढ रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषक शरद गुप्ता का मानना है कि वांगचुक के पास सीमित विकल्प हैं। उन्होंने कहा, वांगचुक के सामने दो ही रास्ते हैं—या तो वे जीडी अग्रवाल की तरह अपना बलिदान दें, या फिर एक सम्मानजनक रास्ता चुनकर अनशन खत्म करें।
विशेषज्ञों का कहना है कि वांगचुक को जेल भेजे जाने या अनहोनी की आशंका हो सकती है, इसलिए वे इस आंदोलन को एक ऐसी दिशा दे रहे हैं जहां कम से कम शिक्षा का मुद्दा संसद में मजबूती से गूंजे।
इस बीच, योगेंद्र यादव ने वांगचुक का बचाव करते हुए स्पष्ट किया कि शर्तों का मतलब आंदोलन का अंत नहीं है। उन्होंने कहा कि 50 वर्षों में पहली बार युवाओं का शिक्षा और रोजगार के मुद्दे पर इकट्ठा होना ही इस आंदोलन की सबसे बड़ी जीत है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वांगचुक ने भूख हड़ताल को खत्म करने की बात कही है, न कि आंदोलन को।
फिलहाल, वांगचुक के इस कदम को जहां कुछ लोग समझौता मान रहे हैं, वहीं कुछ इसे एक व्यावहारिक रणनीति के रूप में देख रहे हैं ताकि आंदोलन का उद्देश्य पूरी तरह विफल न हो जाए। अब सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या विपक्षी दल इन शर्तों पर आकर वांगचुक से मुलाकात करेंगे।
क्या सोनम वांगचुक ने ख़ुद को काकरोच पार्टी के आंदोलन से अलग कर लिया है?
— Prof. Mukesh Kumar (@mukeshbudharwi) July 20, 2026
उन्होंने अपना अनशन तोड़ने की आसान शर्तें रखने से पहले क्या आंदोलन के दूसरे साथियों से बात की?
अगर की थी तो क्या सब उन शर्तों पर राज़ी थे?
क्या उन्होंने ये मान लिया कि सरकार को बख़्श दिया जाए और सारा भार अब…
रोहित शर्मा का सीक्रेट हुआ वायरल: क्या वाकई दाल-चावल ही है उनका असली प्यार?
होर्मुज जलडमरूमध्य पर सुलगा युद्ध: अमेरिका की लगातार 10वीं रात बमबारी, ईरान पर चौतरफा दबाव
बिहार: एक बाइक पर सवार हुए 4 पुलिसकर्मी, वायरल वीडियो देख जनता ने पूछा- क्या इनका भी कटेगा चालान?
भारत पहले से ही एक सुपरपावर : पनामा ने खोला लैटिन अमेरिका का रास्ता
दिल्ली-NCR में फिर लौटा मॉनसून का जोर , कल भी भारी बारिश और तूफान का अलर्ट
गुरुग्राम: सोसायटी में खेलते समय सिर पर गिरा भारी-भरकम बास्केटबॉल पोल, सीसीटीवी में कैद हुई खौफनाक घटना
शुभमन गिल को दोहरा झटका: इंग्लैंड से वनडे सीरीज हारने के बाद ICC अवॉर्ड भी हाथ से फिसला
राजस्थान में लौटा मॉनसून: 12 जिलों में भारी बारिश का अलर्ट, सीकर में सड़कें बनीं दरिया
इंग्लैंड के बाद अब जिम्बाब्वे की बारी: क्या जीत की पटरी पर लौटेगी टीम इंडिया ?
ऑफिस के बाद कैद : बैंक मैनेजर ने गेट पर जड़ा ताला, कर्मचारियों को घर जाने से रोका