उत्तन-विरार सी-लिंक पर संकट: 600 जमीन मालिकों ने फूंका बगावत का बिगुल, प्रशासन की बढ़ी मुश्किलें
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महाराष्ट्र सरकार की महत्वाकांक्षी उत्तन-विरार समुद्री सेतु परियोजना विवादों में घिर गई है। भाईंदर इलाके में जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू होते ही करीब 600 जमीन मालिकों ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। ग्रामीणों का आरोप है कि सरकार उनकी जमीनें जबरन छीनने की कोशिश कर रही है।

क्या है ग्रामीणों का आरोप? स्थानीय जमीन मालिकों का कहना है कि प्रशासन ने बिना किसी उचित पूर्व सूचना के सीधे नोटिस थमा दिए हैं। सबसे बड़ी नाराजगी इस बात को लेकर है कि आपत्तियां दर्ज कराने के लिए महज 15 दिन का समय दिया गया है। ग्रामीणों ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ बताते हुए चेतावनी दी है कि यदि उनकी बात नहीं सुनी गई, तो पूरे क्षेत्र में बड़ा जनआंदोलन शुरू किया जाएगा।

क्या है उत्तन-विरार सी-लिंक परियोजना? यह परियोजना पालघर में बन रहे वाधवन बंदरगाह को मुंबई से जोड़ने के लिए तैयार की जा रही है। इसकी कुल लंबाई 55.12 किलोमीटर प्रस्तावित है, जिस पर करीब 58,754 करोड़ रुपये खर्च होंगे। इसमें 24.35 किलोमीटर का मुख्य समुद्री पुल और 30.77 किलोमीटर के तीन इंटरचेंज मार्ग (उत्तन, वसई और विरार) शामिल हैं। इसे मुंबई-वाधवन एक्सप्रेसवे के नाम से भी जाना जाएगा।

प्रोजेक्ट क्यों है इतना अहम? यह सी-लिंक पश्चिमी उपनगरों और पालघर से दक्षिण मुंबई की ओर जाने वाले यात्रियों के लिए एक बड़ा राहत भरा रास्ता साबित हो सकता है। इससे वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे और एसवी रोड पर ट्रैफिक का बोझ कम होगा। इसका दायरा वर्सोवा-बांद्रा सी-लिंक से भी काफी बड़ा है, जिससे मुंबई के आर्थिक और परिवहन ढांचे को नई गति मिलने की उम्मीद है।

प्रशासन का क्या है रुख? एमएमआरडीए (MMRDA) ने 26 जून को प्रारंभिक अधिसूचना जारी कर मुआवजा देने का प्रस्ताव रखा है। मुआवजे के रूप में एफएसआई (FSI) या टीडीआर (TDR) देने की बात कही गई है। अधिकारियों का दावा है कि अधिग्रहण की पूरी प्रक्रिया कानूनी दायरे में रहकर की जा रही है। एमएमआरडीए ने आश्वासन दिया है कि ग्रामीणों द्वारा दर्ज कराई गई हर आपत्ति पर नियमानुसार विचार किया जाएगा।

आगे क्या होगा? एक तरफ सरकार इसे राज्य के विकास के लिए मील का पत्थर मान रही है, तो दूसरी तरफ ग्रामीणों का अपने पुश्तैनी जमीन को बचाने का संघर्ष इस प्रोजेक्ट के समय पर पूरा होने की राह में बड़ा रोड़ा बन सकता है। अब देखना यह है कि प्रशासन और प्रभावित ग्रामीणों के बीच सामंजस्य कैसे बैठता है।

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