सांस्कृतिक कूटनीति: पिछले 12 वर्षों में भारत ने दुनिया भर में कैसे संवारे प्राचीन मंदिर
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इंडोनेशिया के प्रम्बानन मंदिर में जाना केवल एक कूटनीतिक दौरा नहीं, बल्कि भारत की बदलती सॉफ्ट पावर रणनीति का एक बड़ा हिस्सा है। पिछले 12 वर्षों में भारत ने व्यापार और रक्षा समझौतों से आगे बढ़कर दुनिया भर में फैली अपनी सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजने का बीड़ा उठाया है।

दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय आर्कियोलॉजी का दम भारत सरकार ने दक्षिण-पूर्व एशिया में प्राचीन हिंदू और बौद्ध मंदिरों के संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने वियतनाम के माई सन सैंक्चुअरी में प्राचीन चंपा साम्राज्य के शैव मंदिरों को पुनर्जीवित किया है। वहीं, कंबोडिया के अंगकोर वाट, ता प्रॉम और प्रीह विहार जैसे विश्व प्रसिद्ध परिसरों के संरक्षण में भी भारतीय विशेषज्ञों की अहम भूमिका रही है। 2024 में लाओस के 1,000 साल पुराने वाट फू शिव मंदिर का संरक्षण कार्य पूरा होना इसी कड़ी का हिस्सा है।

सिर्फ हिंदू मंदिर ही नहीं, बौद्ध विरासत भी सुरक्षित भारत की सांस्कृतिक नीति समावेशी रही है। 2016 में म्यांमार में भूकंप आने के बाद, भारत ने तुरंत प्रतिक्रिया दी। 2017 में एक द्विपक्षीय समझौते के तहत भारत ने वहां के ऐतिहासिक आनंद मंदिर और 12 अन्य बौद्ध पैगोडाओं को फिर से संवारने की जिम्मेदारी उठाई। यह कदम दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की सांस्कृतिक स्वीकार्यता को और मजबूत करता है।

नेपाल और बांग्लादेश में मिली नई पहचान नेपाल में 2015 के विनाशकारी भूकंप के बाद भारत ने 5 करोड़ डॉलर के पैकेज से 28 सांस्कृतिक स्थलों का पुनरुद्धार किया, जिसमें सेतो मछिंद्रनाथ मंदिर शामिल है। वहीं, बांग्लादेश में 1971 के युद्ध में नष्ट हुए ढाका के ऐतिहासिक रमना काली मंदिर को भारत की मदद से 2021 में पुनर्जीवित किया गया। इसके अलावा, जॉय काली माता मंदिर के जीर्णोद्धार में भी भारत ने तकनीकी और वित्तीय सहयोग दिया।

खाड़ी देशों तक पहुंची सांस्कृतिक कूटनीति भारत की यह कूटनीति अब खाड़ी देशों तक भी विस्तार ले चुकी है। बहरीन की राजधानी मनामा में 200 साल पुराने श्रीनाथजी मंदिर के पुनर्विकास के लिए 42 लाख डॉलर की परियोजना शुरू की गई। इसका उद्घाटन खुद प्रधानमंत्री स्तर पर किया गया, जो इन देशों के साथ भारत के प्रगाढ़ होते संबंधों का कूटनीतिक संकेत है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह रणनीति? जानकारों का मानना है कि यह केवल पुरातात्विक कार्य नहीं है, बल्कि एक व्यावहारिक विदेश नीति है। जब भारत किसी देश की राष्ट्रीय धरोहर को बचाने में मदद करता है, तो उन देशों के आम नागरिकों के साथ सीधा भावनात्मक जुड़ाव बनता है। यह सांस्कृतिक कूटनीति वैश्विक मंच पर भारत को एक सभ्यतागत शक्ति के रूप में स्थापित कर रही है, जो व्यापारिक संबंधों से अधिक टिकाऊ और भरोसेमंद साबित हो रही है।

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