नर्मदा नदी पर स्थित सरदार सरोवर परियोजना को लेकर दशकों से चला आ रहा राज्यों के बीच का वित्तीय विवाद अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। नई दिल्ली में हुई एक उच्च-स्तरीय बैठक में मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र के बीच वन-टाइम सेटलमेंट (OTS) पर मुहर लग गई है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की मौजूदगी में हुए इस समझौते ने सालों पुराने विवाद को तो खत्म कर दिया, लेकिन इसके आर्थिक परिणाम मध्य प्रदेश के लिए चौंकाने वाले रहे हैं।
मध्य प्रदेश सरकार लंबे समय से डूब क्षेत्र में गई भूमि और प्रभावितों के पुनर्वास के लिए बड़े मुआवजे की मांग कर रही थी। प्रदेश सरकार ने 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून और बाजार भाव के आधार पर 7,669 करोड़ रुपये का दावा पेश किया था।
वहीं, दूसरी ओर गुजरात ने बांध के रखरखाव और निर्माण में मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी का हवाला देते हुए भारी-भरकम राशि का दावा किया था। अंततः, मध्य प्रदेश को मुआवजे के बजाय गुजरात को 550 करोड़ रुपये का भुगतान करने के समझौते पर हस्ताक्षर करने पड़े।
सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ाए जाने के बाद मध्य प्रदेश के लिए मुश्किलें बढ़ गई थीं। साल 2002 में जहां 178 गांव डूब क्षेत्र में थे, वहीं ऊंचाई बढ़ने के साथ यह संख्या बढ़कर 192 गांव हो गई।
कुल 20,822 हेक्टेयर उपजाऊ भूमि डूब में आ जाने के कारण प्रभावित परिवारों के पुनर्वास का मुद्दा हमेशा से सरकार के लिए चुनौती रहा है। इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए मध्य प्रदेश सरकार अतिरिक्त मुआवजे की मांग पर अड़ी थी, ताकि विस्थापितों को उचित लाभ दिया जा सके।
केंद्र सरकार ने इस समझौते को राज्यों के बीच आपसी सहयोग की एक मिसाल करार दिया है। गृह मंत्री अमित शाह ने इसे सहकारी संघवाद का उदाहरण बताते हुए कहा कि नर्मदा परियोजना का लाभ पूरे देश को मिल रहा है, न कि किसी एक राज्य को।
हालांकि, विपक्षी दल कांग्रेस ने इस समझौते को प्रदेश के हितों के साथ खिलवाड़ बताया है। मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने मुख्यमंत्री मोहन यादव पर निशाना साधते हुए कहा कि, प्रदेश ने अपनी जमीनें दी, जंगल खोए और लाखों लोगों का विस्थापन सहा, लेकिन सरकार अपने हक का मुआवजा लेने के बजाय गुजरात को ही 550 करोड़ रुपये देने पर सहमत हो गई।
विपक्ष का आरोप है कि मां नर्मदा का उद्गम होने के बावजूद मध्य प्रदेश के किसान आज भी सिंचाई और पानी की किल्लत से जूझ रहे हैं। इस समझौते के बाद अब प्रदेश सरकार पर यह दबाव बढ़ गया है कि वह जनता को यह समझाए कि आखिर हजारों करोड़ के मुआवजे का दावा 550 करोड़ के भुगतान में कैसे बदल गया। फिलहाल, यह फैसला प्रदेश की राजनीति में एक बड़ी बहस का विषय बन गया है।
मोहन यादव जी आज गुजरात लॉबी के सामने दंडवत प्रणाम करते हुए नतमस्तक हैं।
— Jitendra (Jitu) Patwari (@jitupatwari) July 8, 2026
जिस मध्य प्रदेश ने सरदार सरोवर परियोजना के लिए अपनी ज़मीन दी, अपने जंगल दिए, अपने गाँव डुबोए और लाखों लोगों का विस्थापन झेला, उसी मध्य प्रदेश सरकार ने गुजरात सरकार से 7,669 करोड़ रुपये का मुआवज़ा माँगा था।… pic.twitter.com/Vsa7x6EGjQ
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