एंबुलेंस नहीं तो क्या हुआ? बीमार छात्रा को पीठ पर लादकर 6 किमी पैदल चलीं फरिश्ता वॉर्डन
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इंसानियत के जज्बे को सलाम आज के दौर में जब लोग छोटी-सी जिम्मेदारी से भी जी चुराते हैं, तब आंध्र प्रदेश से आई एक तस्वीर ने मानवता की नई मिसाल पेश की है। एक स्कूल वॉर्डन ने अपने कर्तव्य और ममता के आगे हर मुश्किल को बौना साबित कर दिया। अपनी छात्रा को बचाने के लिए उन्होंने जो किया, वह हर किसी को भावुक कर रहा है।

क्या है पूरा मामला? मामला आंध्र प्रदेश के पार्वतीपुरम मान्यम जिले के गुम्मालक्ष्मीपुरम आदिवासी आश्रम स्कूल का है। यहां एक छात्रा अचानक तेज बुखार की चपेट में आ गई। हालत इतनी खराब थी कि उसे तुरंत अस्पताल ले जाना जरूरी था। लेकिन, दुर्गम पहाड़ी इलाका होने के कारण वहां न तो एंबुलेंस पहुंच सकती थी और न ही कोई गाड़ी।

6 किलोमीटर का कठिन सफर वॉर्डन हेमा ने वक्त गंवाने के बजाय खुद मोर्चा संभाला। उन्होंने बीमार बच्ची को अपनी पीठ पर लादा और अस्पताल की ओर निकल पड़ीं। रास्ता बेहद कठिन था—ऊबड़-खाबड़ पगडंडियां, पत्थर और पहाड़ी चढ़ाई। बावजूद इसके, वॉर्डन ने हार नहीं मानी और 6 किलोमीटर की लंबी दूरी तय कर बच्ची को सुरक्षित अस्पताल पहुंचाया।

वायरल वीडियो ने जीता दिल सोशल मीडिया पर इस घटना का वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में वॉर्डन के चेहरे पर थकान तो साफ दिख रही है, लेकिन उनका हौसला अटूट है। लोग उन्हें रियल हीरो और प्रेरणा की मूरत बताकर सैल्यूट कर रहे हैं। इस निस्वार्थ सेवा के लिए वरिष्ठ अधिकारियों ने भी उनकी सराहना की है।

बुनियादी सुविधाओं पर सवाल यह घटना जितनी प्रेरणादायक है, उतनी ही व्यवस्था पर सवाल भी खड़ा करती है। क्या आज भी हमारे देश के दूरदराज के इलाकों में स्वास्थ्य और सड़कों की इतनी कमी है कि किसी इंसान को जान बचाने के लिए घंटों पैदल चलना पड़े? वॉर्डन हेमा ने तो अपनी जिम्मेदारी निभा दी, लेकिन सरकारी तंत्र को यह सोचने की जरूरत है कि ऐसी नौबत दोबारा न आए।

एक सबक वॉर्डन हेमा की यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्चा कर्तव्य वही है, जो जरूरत के समय किसी की जान बचा सके। उन्होंने साबित किया कि अगर इच्छाशक्ति मजबूत हो, तो सबसे कठिन रास्ते भी छोटे पड़ जाते हैं। उनका यह अदम्य साहस आने वाली पीढ़ी के लिए एक नसीहत है।

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