असम की राजनीति में लंबे समय तक जातीय तनाव और संदिग्ध नागरिकता के मुद्दों ने एक गहरी खाई पैदा कर रखी थी। दशकों से असमिया और बंगाली हिंदू समुदायों के बीच मतभेदों की आग सुलग रही थी। हालांकि, मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में राज्य में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। उन्होंने न केवल इस तनाव को कम किया, बल्कि दोनों समुदायों के बीच मौजूद अविश्वास की दीवार को भी ढहा दिया है।
मुख्यमंत्री ने हाल ही में स्पष्ट किया कि असम के डिटेंशन सेंटर में एक भी बंगाली हिंदू नहीं है। उन्होंने कहा कि एक समय डी-वोटर्स (D-Voters) की संख्या जो लगभग 4.5 लाख थी, वह अब घटकर 1 लाख से भी कम रह गई है। सीएम ने जोर देकर कहा कि बंगाली हिंदुओं की नागरिकता से जुड़ी अधिकांश समस्याओं का समाधान कानूनी प्रक्रिया और ट्रिब्यूनल के जरिए किया जा रहा है।
हिमंता बिस्वा सरमा की सबसे बड़ी उपलब्धि शरणार्थी और घुसपैठिए के बीच का अंतर स्पष्ट करना रही है। उन्होंने जनता को यह समझाने में सफलता हासिल की कि जो लोग धार्मिक उत्पीड़न से बचने के लिए भारत आए, उनकी स्थिति आर्थिक लाभ के लिए अवैध रूप से सीमा पार करने वाले घुसपैठियों से बिल्कुल अलग है। इस तर्क ने असमिया हिंदू समुदाय की उस गलतफहमी को दूर किया कि बंगाली हिंदू उनके दुश्मन हैं।
वर्ष 2019 में जब CAA लागू हुआ, तो असम में भारी विरोध प्रदर्शन हुए थे। राजनीतिक दलों ने तर्क दिया था कि यह असम समझौते के खिलाफ है। लेकिन सीएम सरमा ने CAA को एक ढाल के रूप में पेश किया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि बंगाली हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता संशोधन अधिनियम के तहत संरक्षण मिले, जिससे उन्हें डिटेंशन कैंप भेजने का खतरा खत्म हो गया।
मुख्यमंत्री का यह रुख केवल कागजों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके नतीजे जमीन पर भी दिखे। अगस्त 2025 में सिलचर में हुए उनके स्वागत ने इस बात की गवाही दी कि असमिया भाषी नेता के प्रति बंगाली समाज का भरोसा कितना बढ़ गया है। यह वह सामाजिक एकता है, जिसकी कल्पना कुछ साल पहले तक करना भी मुश्किल था।
असम में जातीय दरारों का फायदा उठाकर अपनी रोटियां सेंकने वाले राजनीतिक समूहों के लिए अब कोई जगह नहीं बची है। सामाजिक सौहार्द और एकजुटता के इस मॉडल ने यह साबित कर दिया है कि अगर नेतृत्व के पास स्पष्ट विजन और इच्छाशक्ति हो, तो दशकों पुराने जातीय संघर्षों का भी अंत किया जा सकता है। असम अब एक स्थायी सुलह की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
असम में एक भी हिंदू बंगाली Detention Camp में नहीं है।@IndianExpress pic.twitter.com/GAVgsSJsL1
— Himanta Biswa Sarma (@himantabiswa) July 4, 2026
दिलजीत दोसांझ की सतलुज पर लगा ग्रहण: रिलीज के तीसरे दिन ही प्लेटफॉर्म से हटाई गई फिल्म
पटना AIIMS का होगा कायाकल्प: अब 200 नए बेड और सुपर स्पेशियलिटी सेवाओं से लैस होगा अस्पताल
ईरान के जनाजे में गूंजी भारतीय पंडित की आवाज, अमेरिका को लेकर दिया बड़ा बयान!
सिर्फ पैर टूटा था, फिर 16 लाख का बिल और अर्थी: रांची के अस्पताल पर लगे मौत के गंभीर आरोप
ओटीटी से हटाई गई दिलजीत दोसांझ की फिल्म सतलुज , एक्टर बोले- बैन होने से पहले देख डालो
हरियाणा के ग्रामीण सफाई कर्मचारियों की दिवाली: वेतन में 2100 रुपये की बंपर बढ़ोतरी, जानें अब कितनी मिलेगी सैलरी
किशनगंज में राजद का 30वां स्थापना दिवस: सामाजिक न्याय के संकल्प के साथ फहराया परचम
पितृ पक्ष में करें भारत के इन 3 राज्यों के पवित्र तीर्थों के दर्शन, IRCTC लाया है खास टूर पैकेज
चाय, बन-मस्का और सियासी हुंकार: लखनऊ की गलियों से नितिन नवीन ने फूंका 2027 का बिगुल
अमरनाथ यात्रा पर उमड़ी भारी भीड़: बिना रजिस्ट्रेशन यात्रा न करने की एलजी मनोज सिन्हा ने की अपील