ई20 पेट्रोल को लेकर छिड़ा विवाद: ऑटो एक्सपर्ट्स और कंपनियों के बयानों में दिख रहा विरोधाभास
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पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल (E20) मिलाने के सरकार के फैसले पर इन दिनों सोशल मीडिया पर तीखी बहस चल रही है। वाहन मालिकों का दावा है कि इससे इंजन खराब हो रहे हैं और माइलेज में भारी गिरावट आ रही है। इस विवाद के बीच ऑटो उद्योग के विशेषज्ञों ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की, लेकिन कंपनियों के अधिकारियों के बयानों में विरोधाभास ने उलझन और बढ़ा दी है।

कंपनियों के दावों में यू-टर्न ?

प्रेस कॉन्फ्रेंस में टोयोटा किर्लोस्कर मोटर के कंट्री हेड विक्रम गुलाटी ने E20 को बेहतरीन ईंधन बताते हुए इसकी ड्राइवेबिलिटी की जमकर तारीफ की। उन्होंने इसे प्रदर्शन के मामले में शानदार बताया। हालांकि, बीते शुक्रवार को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने खुद स्वीकार किया था कि इथेनॉल के इस्तेमाल से ईंधन दक्षता (माइलेज) में कमी आती है। इस विरोधाभास ने उपभोक्ताओं के मन में संदेह पैदा कर दिया है कि आखिर तकनीक की वास्तविकता क्या है।

विशेषज्ञों का तर्क: वैज्ञानिक रूप से सुरक्षित

इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड की पूर्व सीएमडी वर्तिका शुक्ला ने बताया कि इथेनॉल ब्लेंडिंग रातों-रात नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक प्रक्रिया के तहत की गई है। उन्होंने जोर दिया कि कनाडा, अमेरिका और ब्राजील जैसे देश वर्षों से इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। वहीं, मारुति सुजुकी के राहुल भारती ने स्पष्ट किया कि 2023 से पहले बनी कारों का E20 ईंधन के साथ परीक्षण किया गया है और इसमें पुर्जों के घिसने या जंग लगने का कोई खतरा नहीं है।

क्या पुरानी गाड़ियों के लिए जोखिम है?

विशेषज्ञों के दावों के बावजूद, पुराने वाहनों के मालिकों की चिंता बरकरार है। कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि जो गाड़ियां केवल E10 के लिए डिजाइन की गई थीं, उनमें इथेनॉल से होने वाली रसायनिक प्रतिक्रिया के कारण फ्यूल पाइप, गैसकेट और टैंक को नुकसान हो सकता है। यद्यपि सरकार और कंपनियां इसे मिथक बता रही हैं, लेकिन स्वतंत्र विशेषज्ञों का सुझाव है कि इंजन ट्यूनिंग में बदलाव किए बिना पुरानी गाड़ियों में लंबे समय तक E20 का असर दिखाई दे सकता है।

सरकार का जवाब और डीज़ल में ब्लेंडिंग की तैयारी

पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने इन दावों को सिरे से खारिज करते हुए इसे अफवाह करार दिया है। उन्होंने कहा कि इथेनॉल कोई नई अवधारणा नहीं है और भारत इसे आयात पर निर्भरता कम करने के लिए अपना रहा है। इस बीच, सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने एक बड़ा संकेत देते हुए कहा है कि सरकार अब डीज़ल में भी 15 प्रतिशत तक आइसोब्यूटेनॉल मिलाने की तैयारी कर रही है।

निष्कर्ष: पारदर्शिता की दरकार

सरकार और ऑटो कंपनियां जहां इसे पर्यावरण और अर्थव्यवस्था के लिए हितकारी बता रही हैं, वहीं सोशल मीडिया पर उपयोगकर्ताओं का अनुभव अलग है। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को न केवल दावों को खारिज करना चाहिए, बल्कि तकनीकी समाधानों और पुरानी गाड़ियों के रखरखाव को लेकर स्पष्ट गाइडलाइंस जारी करनी चाहिए ताकि उपभोक्ताओं का भरोसा कायम रह सके।

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