क्या मैं मर गई हूं? : पार्टी में मची भगदड़ पर ममता बनर्जी का तीखा पलटवार, अब खुद संभालेंगी कमान
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विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) लगातार बिखराव का सामना कर रही है। अब पार्टी की प्रदेशाध्यक्ष और ममता बनर्जी की करीबी चंद्रिमा भट्टाचार्या के इस्तीफे ने संकट को और गहरा दिया है। इस घटनाक्रम के बाद ममता बनर्जी ने मोर्चा संभालते हुए बड़ा ऐलान किया है।

ममता की सफाई , पार्टी की कमान अब सीधे उनके हाथ शनिवार को फेसबुक लाइव के जरिए ममता बनर्जी ने साफ किया कि चंद्रिमा का इस्तीफा अचानक लिया गया फैसला नहीं है। ममता ने दावा किया कि चंद्रिमा के बेटे पहले ही बागी गुट में शामिल हो चुके थे, जिससे यह स्क्रिप्ट बहुत पहले लिखी जा चुकी थी। ममता ने ऐलान किया कि सुब्रत बख्शी की बीमारी के चलते अब पार्टी की बागडोर वे खुद संभालेंगी। इसके साथ ही कुणाल घोष और मदन मित्रा को पार्टी का महासचिव नियुक्त किया गया है।

क्या मैं मर गई हूं? पार्टी के असली होने के दावों पर ममता ने तंज कसते हुए कहा, लोग पूछ रहे हैं कि असली टीएमसी कौन सी है? आप क्यों सोच रहे हैं? क्या मैं मर गई हूं? उन्होंने स्पष्ट किया कि चुनाव चिह्न या कानूनी दांव-पेच उनकी आवाज को नहीं दबा सकते। उन्होंने कहा कि वो जनता के बीच जाकर अपनी बात रखेंगी और कोई उन्हें रोक नहीं पाएगा।

गद्दारों को ममता की दो टूक: बीजेपी में शामिल हो जाओ बागी नेताओं पर बरसते हुए ममता ने कहा कि जो लोग उनके हस्ताक्षर और चुनाव चिह्न पर जीतकर आए, आज वे ही कह रहे हैं कि पार्टी का कोई अस्तित्व नहीं है। उन्होंने बागियों को खुली चुनौती दी और कहा, बेईमानी की भी एक सीमा होती है। अगर आपमें हिम्मत है, तो छिपकर वार करने के बजाय सीधे बीजेपी में शामिल हो जाएं, लेकिन टीएमसी को तोड़ने की कोशिश न करें।

21 जुलाई को शहीद सभा का ऐलान तमाम कानूनी पाबंदियों और कोलकाता में पुलिस द्वारा रैलियों पर लगी रोक के बावजूद, ममता ने 21 जुलाई को शहीद सभा करने का ऐलान किया है। उन्होंने प्रशासन पर सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या शहर में अगस्त तक धारा 144 लागू है? ममता ने यह साफ कर दिया है कि वे अपनी राजनीतिक गतिविधियों को किसी भी हाल में थमने नहीं देंगी।

लगातार मिल रहे झटके विधानसभा से लेकर लोकसभा तक, टीएमसी लगातार टूट रही है। कई वरिष्ठ नेताओं के इस्तीफे और पार्टी कार्यालय पर कब्जे की खबरों ने ममता के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अब देखना यह होगा कि पार्टी की कमान खुद अपने हाथों में लेने के बाद क्या ममता बनर्जी बिखरते हुए इस जनाधार को फिर से एकजुट कर पाती हैं।

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