यूरोप में हाहाकार, चीन में सुकून: 50 डिग्री तापमान में भी कैसे ठंडा है ड्रैगन?
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यूरोप और उत्तरी अमेरिका इन दिनों भीषण हीटवेव की चपेट में हैं। तापमान 45 डिग्री तक पहुंचते ही वहां जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है, अस्पतालों में मरीजों की भीड़ है और बिजली व्यवस्था चरमरा गई है।

लेकिन इसी दौर में चीन के शिनजियांग और शांक्सी जैसे इलाकों में पारा 50 डिग्री तक पहुंच रहा है, फिर भी वहां यूरोप जैसी अफरा-तफरी नहीं है। आखिर चीन इस चिलचिलाती गर्मी को कैसे काबू कर रहा है?

छत से गिरती जादुई बारिश

चीन के युनचेंग शहर की ऊंची इमारतों से आजकल एक अनोखा नजारा दिख रहा है। इमारतों की छतों से पानी की सूक्ष्म फुहारें छोड़ी जा रही हैं। यह बारिश की तरह जमीन पर नहीं गिरती, बल्कि गर्म हवा के संपर्क में आते ही भाप बनकर उड़ जाती है।

इसे मिस्ट कूलिंग सिस्टम कहा जाता है। यह हवा में मौजूद गर्मी को सोख लेती है, जिससे इमारत के आसपास का तापमान कुछ ही मिनटों में 5 से 8 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है।

क्या है चीन की तकनीक का विज्ञान?

इस तकनीक के पीछे इवैपोरेटिव कूलिंग (वाष्पीकरण) का सिद्धांत काम करता है। जब पानी की इतनी महीन बूंदें हवा में छोड़ी जाती हैं, तो वे गर्मी को अवशोषित करके वातावरण को ठंडा कर देती हैं।

चीन ने इसे केवल एक प्रयोग के तौर पर नहीं, बल्कि आपदा प्रबंधन के एक बड़े हथियार के रूप में इस्तेमाल करना शुरू किया है। वहां के लोग सदियों से ऐसी भीषण गर्मी के आदी हैं, इसलिए वे तकनीक के साथ तालमेल बिठाकर इसे झेलने में सक्षम हैं।

क्या दुनिया अपनाएगी यह मॉडल?

सोशल मीडिया पर इस तकनीक के वायरल होते ही पूरी दुनिया में चर्चा शुरू हो गई है कि आखिर यूरोप और अमेरिका इस तकनीक का उपयोग क्यों नहीं कर रहे?

हालांकि, वैज्ञानिक कुछ सावधानियां भी बरत रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तकनीक में भारी मात्रा में पानी की खपत होती है, जो भविष्य में जल संकट पैदा कर सकती है। साथ ही, नोजल सिस्टम में खनिजों का जमना और बड़े पैमाने पर प्रभावशीलता जैसे सवाल अभी भी बरकरार हैं।

गर्मी से बचने का नया हथियार

अभी यह स्पष्ट नहीं है कि क्या यह तकनीक घरों के अंदर भी ठंडक पहुंचाती है, लेकिन शहरों के हीट आइलैंड प्रभाव को कम करने में यह मील का पत्थर साबित हो रही है।

चीन का यह अनोखा विज्ञान भविष्य में एयर कंडीशनर का एक पर्यावरण-अनुकूल विकल्प बन सकता है। अगर इसके नतीजे लंबे समय तक सफल रहे, तो छतों से होती बारिश दुनिया को ग्लोबल वार्मिंग के खतरे से बचाने का नया जरिया बन सकती है।

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