24 करोड़ का पुल तैयार, फिर भी नाव ही सड़क : किशनगंज में हजारों जान जोखिम में
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किशनगंज जिले के ठाकुरगंज प्रखंड में स्थित दल्लेगांव घाट पर विकास की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो सरकारी दावों की पोल खोल रही है। मैंची नदी पर करोड़ों खर्च करने के बाद भी हजारों ग्रामीण आज अपनी जान हथेली पर रखकर नाव से सफर करने को मजबूर हैं।

नाव ही बनी जीवन रेखा दल्लेगांव, भवानीगंज, बैगनबाड़ी और तेलीभीट्टा समेत कई गांवों के हजारों लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए इसी घाट पर निर्भर हैं। स्कूल जाने वाले बच्चे हों, अस्पताल जाते मरीज या खेतों की ओर बढ़ते किसान—सभी के लिए छोटी नाव ही एकमात्र साधन है। अक्सर नावों में क्षमता से अधिक भीड़ होने के कारण हर दिन बड़ा हादसा होने का डर बना रहता है।

पुल बना, पर रास्ते बंद हैरानी की बात यह है कि वर्ष 2019 में करीब 24 करोड़ रुपये की लागत से मैंची नदी पर पुल का निर्माण शुरू हुआ था। मुख्य पुल का ढांचा तो खड़ा हो गया है, लेकिन एप्रोच रोड (संपर्क मार्ग) का काम सालों से अधूरा पड़ा है। यही वजह है कि करोड़ों की लागत से बना यह पुल आज ग्रामीणों के लिए केवल एक शो-पीस बनकर रह गया है।

बरसात में सफर बनता है मौत का खेल सामान्य दिनों में यह यात्रा जोखिम भरी होती है, लेकिन मानसून के दौरान स्थिति और भी भयावह हो जाती है। जब नदी का जलस्तर बढ़ता है, तो नाव पलटने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इसके बावजूद ग्रामीणों के पास कोई विकल्प नहीं है। बीमारों को अस्पताल ले जाने के लिए भी उन्हें इसी खतरनाक रास्ते का सहारा लेना पड़ता है।

जिम्मेदार कब जागेंगे? स्थानीय ग्रामीणों ने प्रशासन और संबंधित विभाग से मांग की है कि एप्रोच रोड का काम जल्द से जल्द पूरा किया जाए। लोगों का कहना है कि पुल का पूरा लाभ तभी मिलेगा जब संपर्क मार्ग तैयार होगा। फिलहाल, किशनगंज की इस तस्वीर ने विकास की गति और फाइलों के रखरखाव पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। जब तक सड़क पूरी नहीं होती, तब तक दल्लेगांव घाट पर मौत और जिंदगी का यह खेल जारी रहेगा।

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