पाकिस्तान से दोस्ती का खुला पत्र : भारत के उन 61 बुद्धिजीवियों पर सवाल, जो आतंकवाद पर खामोश हैं
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भारत और पाकिस्तान के बीच कथित शांति और संवाद की वकालत करने वाले 117 बुद्धिजीवियों का एक ओपन लेटर इन दिनों चर्चा का केंद्र बना हुआ है। सेंटर फॉर पीस एंड प्रोग्रेस नाम के संगठन द्वारा जारी इस चिट्ठी पर भारत के 61 और पाकिस्तान के 56 लोगों के हस्ताक्षर हैं। यह पत्र ऐसे समय में सामने आया है जब सीमा पार से भारत को लगातार धमकियां मिल रही हैं।

क्या हैं इस चिट्ठी की मांगें?

इस तीन पन्नों के पत्र में दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों को बहाल करने, उच्चायुक्तों (High Commissioners) की नियुक्ति करने, व्यापार फिर से शुरू करने और अटारी-वाघा बॉर्डर समेत बस सेवाओं को दोबारा चालू करने की मांग की गई है। पत्र में जम्मू-कश्मीर के मुद्दों पर भी बातचीत का आग्रह किया गया है।

आतंकवाद का जिक्र तक नहीं

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस पूरी चिट्ठी में आतंकवाद शब्द का कहीं भी उल्लेख नहीं है। भारत में बैठे इन कथित मानवतावादियों ने न तो पहलगाम जैसी आतंकी घटनाओं की निंदा की है और न ही उन 26 निर्दोष नागरिकों की मौत पर संवेदना जताई है, जिन्हें हाल ही में आतंकियों ने धर्म पूछकर गोलियों से छलनी कर दिया था।

पाकिस्तान प्रेम या बौद्धिक बेईमानी ?

सवाल यह उठ रहा है कि जो लोग खुद को बौद्धिक और मानवतावादी कहते हैं, वे पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद पर क्यों चुप हैं? जानकारों का कहना है कि यह कोई अचानक से उपजी वैचारिक एकता नहीं है, बल्कि दशकों से चल रही एक सोची-समझी कोशिश है। फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती और मणिशंकर अय्यर जैसे नाम वर्षों से इसी संवाद की रट लगाए हुए हैं।

राजनीतिक फायदे का खेल?

विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान से बातचीत की वकालत करने वाले ये नेता अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं।

भारत की सुरक्षा सर्वोपरि

यह चिट्ठी ऐसे समय में आई है जब अमरनाथ यात्रियों की सुरक्षा के लिए अत्याधुनिक एंटी-ड्रोन गन तैनात करनी पड़ रही है। जिन लोगों को पाकिस्तान से सांस्कृतिक और राजनयिक संबंध सुधारने की इतनी जल्दी है, वे शायद यह भूल चुके हैं कि भारत की सरकार और सुरक्षा एजेंसियां कूटनीति की शर्तें अपनी शर्तों पर तय करती हैं।

पाकिस्तान के मंत्री आज भी भारत को हाथ काटने की धमकी दे रहे हैं, लेकिन शांतिदूत बने ये 61 भारतीय उन धमकियों को अनदेखा कर दोस्ती का हाथ बढ़ाने को कह रहे हैं। क्या यह मानवतावाद है या फिर आतंकवाद के सामने घुटने टेकने की तैयारी? यह सवाल आज हर भारतीय के मन में है।

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