नई दिल्ली: कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा गाजा संघर्ष को लेकर की गई हालिया टिप्पणी पर जोरदार राजनीतिक विवाद छिड़ गया है। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता आरपी सिंह ने सोनिया गांधी के इस रुख को चयनात्मक आक्रोश (Selective Outrage) करार देते हुए कांग्रेस के पुराने इतिहास पर सवाल उठाए हैं।
नैतिकता पर सवाल और कांग्रेस का अतीत आरपी सिंह ने सोनिया गांधी को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर नैतिकता का पाठ पढ़ाने से पहले कांग्रेस को अपने कार्यकाल के काले अध्यायों की सफाई देनी चाहिए। उन्होंने मुख्य रूप से 1984 के सिख विरोधी नरसंहार और उसके बाद पंजाब के दर्दनाक दौर का जिक्र किया।
सतनामी बाई का दर्द और सोनिया की चुप्पी सिंह ने 1984 की पीड़िता सतनामी बाई की व्यथा को याद दिलाया। उन्होंने पूछा कि क्या सोनिया गांधी ने कभी सतनामी बाई के आंसू पोंछने की कोशिश की? सतनामी बाई ने अपनी आंखों के सामने अपने पति को लोहे की सरियों से पीटकर और जिंदा जलाकर मार डाले जाते देखा था। आरपी सिंह ने चुनौती दी कि क्या सोनिया गांधी ने कभी सार्वजनिक रूप से इन पीड़ित महिलाओं का नाम लिया या उन्हें सांत्वना दी?
जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है भाजपा प्रवक्ता ने राजीव गांधी के उस विवादास्पद बयान को भी याद किया, जिसमें उन्होंने 1984 की हिंसा के बाद कहा था— जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है। सिंह के अनुसार, यह बयान उस भीषण हिंसा को उचित ठहराने जैसा था और इसने सिख परिवारों के घावों पर नमक छिड़कने का काम किया।
पंजाब की त्रासदी और संदेह की दृष्टि लेख में पंजाब के उन वर्षों का भी उल्लेख किया गया है, जब पूरा राज्य आतंकवाद और उसके खिलाफ अभियानों की चपेट में था। जबरन गायब किए जाने, फर्जी मुठभेड़ों और अवैध अंतिम संस्कारों ने पंजाब की एक पूरी पीढ़ी को प्रभावित किया। आरपी सिंह ने अफसोस जताया कि जो सिख समुदाय देश की रक्षा के लिए जाना जाता है, उसे कांग्रेस की नीतियों और बयानों के कारण संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा।
नैतिक विश्वसनीयता का संकट आरपी सिंह ने अंत में कहा कि निर्दोषों के लिए संवेदना होना मानवीय है, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व की यह संवेदनशीलता केवल चयनात्मक क्यों है? उन्होंने आरोप लगाया कि सोनिया गांधी का गाजा पर लेख मानवाधिकारों के प्रति चिंता नहीं, बल्कि राजनीतिक ढोंग है। उन्होंने मांग की कि भारत को उपदेश देने से पहले कांग्रेस को 1984 के पीड़ितों को न्याय दिलाने की अपनी विफलता का जवाब देना चाहिए।
*सेलेक्टिव आक्रोश से कांग्रेस का इतिहास नहीं मिट सकता।
— RP Singh National Spokesperson BJP (@rpsinghkhalsa) June 27, 2026
गाज़ा पर सोनिया गांधी का लेख नैतिकता का पाठ नहीं, बल्कि चयनात्मक आक्रोश का एक जीवंत उदाहरण है।
भारत को मानवाधिकारों का उपदेश देने से पहले कांग्रेस नेतृत्व को स्वतंत्र भारत के सबसे काले अध्यायों में से एक-1984 के सिख विरोधी… pic.twitter.com/8OPy0GoxVH
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