कच्चातिवु आइलैंड: इंदिरा गांधी का उपहार या कूटनीतिक चूक? जानिए विवाद का सच
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भारत और श्रीलंका के बीच स्थित कच्चातिवु आइलैंड एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे द्वारा तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर इसे श्रीलंका को दान में देने का आरोप लगाने के बाद से यह पुराना विवाद फिर से गरमा गया है। आइए, इस जटिल मुद्दे के हर पहलू को समझते हैं।

निशिकांत दुबे का गंभीर आरोप

बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि 26 जून 1974 को इंदिरा गांधी ने कच्चातिवु आइलैंड श्रीलंका को सौंप दिया था। उन्होंने आरोप लगाया कि इस निर्णय ने तमिलनाडु के मछुआरों के लिए हर दिन का संघर्ष पैदा कर दिया है, जिन्हें श्रीलंका में अक्सर गिरफ्तार कर यातनाएं दी जाती हैं। दुबे का यह भी कहना है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि को अंधेरे में रखकर यह समझौता किया गया था।

कच्चातिवु का भौगोलिक और धार्मिक महत्व

कच्चातिवु भारत और श्रीलंका के बीच पाक जलडमरूमध्य (Palk Strait) में स्थित मात्र 285 एकड़ का एक निर्जन द्वीप है। यह भारत के रामेश्वरम से 33 किमी और श्रीलंका के जाफना से 62 किमी दूर है। पीने के पानी के अभाव के कारण यहाँ कोई स्थायी आबादी नहीं है। हालांकि, यहाँ स्थित सेंट एंथोनी चर्च का धार्मिक महत्व बहुत अधिक है, जहाँ हर साल भारत और श्रीलंका के ईसाई समुदाय के लोग जुटते हैं।

विवाद का ऐतिहासिक सफर

सदियों तक यह द्वीप मदुरै के रामनाद साम्राज्य के अधीन था और ब्रिटिश काल में मद्रास प्रेसीडेंसी का हिस्सा बना। हालांकि, श्रीलंका ने भी इस पर अपना दावा बनाए रखा। 1921 में दोनों देशों के बीच मछली पकड़ने के अधिकारों को लेकर विवाद हुआ, जो लंबे समय तक अनसुलझा रहा।

1974 और 1976 के समझौते

26 जून 1974 को इंदिरा गांधी और श्रीलंका की तत्कालीन प्रधानमंत्री सिरिमावो भंडारनायके के बीच एक समझौता हुआ, जिसके तहत भारत ने औपचारिक रूप से इस द्वीप को श्रीलंका का हिस्सा मान लिया। समझौते में भारतीय मछुआरों को वहां जाल सुखाने और चर्च में जाने की छूट दी गई थी। हालांकि, 1976 के एक और समझौते ने एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन निर्धारित कर भारतीय मछुआरों के लिए मुश्किलें बढ़ा दीं, जिससे वे अंतरराष्ट्रीय सीमा लांघने को मजबूर हुए।

तमिलनाडु का विरोध और कानूनी दांव-पेंच

तमिलनाडु सरकार हमेशा से इस समझौते का विरोध करती रही है। 1991 में जे. जयललिता सरकार ने इस द्वीप को वापस लाने के लिए विधानसभा में प्रस्ताव पारित किया था। 2008 में जयललिता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर 1974 के समझौते को चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि बिना संसद की मंजूरी के भारत की भूमि किसी अन्य देश को नहीं दी जा सकती।

आज का संकट: मछुआरों की रोजी-रोटी

वर्तमान में कच्चातिवु सिर्फ एक टापू नहीं, बल्कि लाखों मछुआरों की रोजी-रोटी का सवाल है। पारंपरिक अधिकार खत्म होने के कारण, अक्सर भारतीय मछुआरों को श्रीलंकाई नौसेना द्वारा गिरफ्तार कर लिया जाता है। संवैधानिक वैधता का यह मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, और यह विवाद भारत-श्रीलंका संबंधों में एक संवेदनशील बिंदु बना हुआ है।

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