गुवाहाटी के नीलांचल पर्वत पर स्थित माता कामाख्या देवी मंदिर के कपाट आज, 26 जून को औपचारिक रूप से भक्तों के लिए दोबारा खोल दिए गए हैं। चार दिनों तक चले ‘अंबुबाची महायोग’ के बाद निवृत्ति अनुष्ठान संपन्न हुआ, जिसके साथ ही मंदिर प्रांगण में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुट गई है।
अंबुबाची का महत्व और मंदिर की मान्यता असम के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में शामिल अंबुबाची मेले के दौरान हर साल जून के महीने में तीन दिनों के लिए मंदिर के द्वार बंद कर दिए जाते हैं। मान्यता है कि इस दौरान माता कामाख्या रजस्वला होती हैं और यह समय उनके विश्राम का होता है। इस अवधि में गर्भ गृह में स्थित शिला के सामने एक सफेद वस्त्र बिछा दिया जाता है।
समापन के बाद की विशेष प्रक्रिया मेले के समापन और मंदिर के कपाट खुलने के साथ ही मां कामाख्या को विशेष स्नान कराया जाता है। इसके बाद दैनिक यज्ञ, हवन और पूजा-अर्चना की शुरुआत होती है। मंदिर के मुख्य द्वार खुलने के बाद देवी को ताजे फल, मिठाइयां और विशेष भोग अर्पित किए जाते हैं। मान्यता है कि इस दौरान किए गए प्रथम दर्शन से श्रद्धालुओं को मां की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
पवित्र ‘अंगोदक’ और ‘अंगवस्त्र’ का महत्व मंदिर के कपाट खुलने के बाद भक्तों के बीच सबसे अधिक आकर्षण का केंद्र ‘अंगोदक’ और ‘अंगवस्त्र’ होते हैं। मान्यता है कि मंदिर बंद होने के समय जो सफेद वस्त्र शिला के सामने बिछाया जाता है, वह इन तीन दिनों में प्राकृतिक रूप से लाल हो जाता है। इसी पवित्र वस्त्र को अंगवस्त्र कहा जाता है, जिसे प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं में बांटा जाता है। इसे बेहद शुभ और पूजनीय माना जाता है।
शक्ति उपासना का केंद्र: कामाख्या माता कामाख्या मंदिर शक्ति उपासना का सबसे प्रमुख केंद्र माना जाता है। इस मंदिर की अनूठी विशेषता यह है कि यहां देवी की कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि एक प्राकृतिक शिला (योनिकुंड) की पूजा की जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यहीं पर माता सती का योनि भाग गिरा था, जिससे यह स्थान शक्तिपीठ के रूप में विख्यात हुआ।
अस्वीकरण: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और प्रचलित लोक कथाओं पर आधारित है।
#WATCH | Assam | Devotees throng the Kamakhya temple in Guwahati after the main door of the temple was reopened following the four-day Ambubachi Mahayog. pic.twitter.com/TsSHkaN1NX
— ANI (@ANI) June 26, 2026
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