एक भी मुस्लिम घर नहीं, फिर भी महाराष्ट्र के इस गांव में ज़िंदा है मोहर्रम की अनोखी रवायत
News Image

महाराष्ट्र के सतारा जिले के भुसणी-भुसणीवाड़ी ग्रुप ग्राम पंचायत के अंतर्गत आने वाला बेरडवाड़ी गांव आज देश भर के लिए भाईचारे की मिसाल बन गया है। इस गांव की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहाँ एक भी मुस्लिम परिवार नहीं रहता, फिर भी पिछले सैकड़ों सालों से यहाँ मोहर्रम की रवायत पूरी श्रद्धा के साथ मनाई जाती है।

इतिहास और विरासत का संगम यह गांव क्रांतिकारी उमाजी नाईक और मराठा साम्राज्य के खुफिया प्रमुख बहिर्जी नाईक के वंशजों (रामोशी/बेरड समाज) का है। अपनी बहादुरी के लिए मशहूर इस समाज ने अपनी जड़ों और इतिहास को तो संभाल कर रखा ही है, साथ ही सामाजिक एकता की एक ऐसी विरासत को भी संजोया है, जो आज के दौर में दुर्लभ है।

मस्जिद नहीं, फिर भी गूंजता है इमाम का नाम गांव में कोई मस्जिद नहीं है, लेकिन मोहर्रम के 10 दिनों तक पूरा गांव बारह इमाम और कासिम इमाम की अकीदत में डूब जाता है। रस्मों को सही तरीके से निभाने के लिए पड़ोसी गांवों से मुस्लिम मुजावरों को ससम्मान आमंत्रित किया जाता है। गांव के युवा पारंपरिक करबल का खेल खेलते हैं और पूरी अकीदत के साथ इबादत में शामिल होते हैं।

सामाजिक बदलाव का जरिया बना मोहर्रम बेरडवाड़ी के निवासियों ने मोहर्रम को केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रखा है। इस दौरान गांव में रक्तदान शिविर, लोक नृत्य, नाटक और सामाजिक जागरूकता के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। गांव के उपसरपंच दशरथ मंडले बताते हैं कि मोहर्रम का अवसर गांव के लोगों के बीच आपसी प्रेम और भाईचारे को और मजबूत बनाता है।

प्रवासी भी लौटते हैं अपने घर इस आयोजन की खास बात यह है कि मुंबई, पुणे जैसे शहरों में नौकरी और काम के सिलसिले में गए गांव के युवा भी मोहर्रम के मौके पर अपने घर लौट आते हैं। यह समय गांव में एक बड़े पारिवारिक उत्सव जैसा होता है, जहां पूरा समाज एकजुट होकर महाप्रसाद ग्रहण करता है।

सोशल मीडिया पर वायरल हुई अनोखी मिसाल गांव के ही उमेश भोकले द्वारा इंस्टाग्राम पर साझा किए गए मोहर्रम के वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहे हैं। उमेश का कहना है कि उन्हें इस बात पर गर्व है कि उनकी पीढ़ी अपनी पुरानी परंपराओं को आज के आधुनिक दौर में भी पूरी शिद्दत से आगे बढ़ा रही है।

जाति-पाति से ऊपर मानवता श्री षण्मुखेश्वर विद्यालय के स्पोर्ट्स टीचर अंकुश मंडले के शब्दों में, बेरडवाड़ी में जाति-पाति और भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं है। हम मानते हैं कि ईश्वर एक ही है। राजस्व सेवक शिवशंकर मंडले के अनुसार, गांव का हर व्यक्ति किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत इमाम साहब को याद करके ही करता है।

महाराष्ट्र की यह मिली-जुली तहज़ीब आज देश के लिए एक प्रेरणा है। बेरडवाड़ी ने साबित कर दिया है कि आस्था और परंपराएं किसी मजहबी सरहद की मोहताज नहीं होतीं, बल्कि वे उन दिलों में बसती हैं जो मानवता और भाईचारे का सम्मान करना जानते हैं।

*

कुछ अन्य वेब स्टोरीज

Story 1

जॉन अब्राहम पर चढ़ा क्रिकेट का खुमार: अब यूरोपियन टी20 लीग में मचाएंगे धमाल

Story 1

वेनेजुएला में प्रलय: दो शक्तिशाली भूकंपों से मची तबाही, 235 लोगों की मौत, हजारों मलबे में दबे

Story 1

नागपुर एयरपोर्ट का कायाकल्प: GMR के हाथ में कमान, अब सिंगापुर-दुबई के लिए उड़ान की तैयारी

Story 1

भागलपुर में अल-नीनो का ग्रहण: मानसून बेअसर, धान की खेती पर मंडराया संकट

Story 1

मधेपुरा: अरार थाना के नए कप्तान धीरज कुमार ने संभाली कमान, अपराधियों को दी सख्त चेतावनी

Story 1

मुहर्रम: दिल्ली में आज ट्रैफिक का बड़ा बदलाव, घर से निकलने से पहले इन रास्तों की जानकारी जरूर लें

Story 1

बहुविवाह पर घिरीं NCP विधायक सना मलिक, शायना एनसी का तीखा सवाल- क्या पति को 4 शादी की इजाजत देंगी?

Story 1

तत्काल पासपोर्ट चाहिए? Tatkaal Scheme के जरिए 3 दिन में पाएं पासपोर्ट, जानें फीस और जरूरी नियम

Story 1

94 की उम्र में वतन वापसी की जिद: भारतीय महिला ने छोड़ी अमेरिकी नागरिकता, बोलीं- आखिरी सांस यहीं लेनी है

Story 1

कर्बला की याद और युद्ध का दंश: ईरान में इस बार क्यों अलग था मुहर्रम का मातम?